
Hatkeshwar Mahadev: वडनगर को नागर ब्राह्मणों का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। इसी ऐतिहासिक नगरी में नागर समाज के इष्टदेव हाटकेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर को करीब 2200 वर्ष पुराना माना जाता है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं और इसकी अद्भुत शिल्पकला इसे गुजरात के प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों में शामिल करती हैं।
क्या है पौराणिक कथा?
एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, चित्रगुप्त नाम के एक ब्राह्मण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए वडनगर में कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि वडनगर में मंदिर बनाकर उसमें सोने के शिवलिंग की स्थापना करें, जिसके बाद वह स्वयंभू रूप में प्रकट होंगे।
इसके बाद यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया और मान्यता के अनुसार भगवान शिव स्वयंभू रूप में यहां प्रकट हुए। इसी वजह से हाटकेश्वर महादेव मंदिर को भक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र माना जाता है।
मंदिर में रामायण-महाभारत के प्रसंगों की नक्काशी
हाटकेश्वर महादेव मंदिर की वास्तुकला और पत्थरों पर की गई नक्काशी बेहद आकर्षक है। मंदिर में नवग्रह, संगीतकार, नृत्य करती अप्सराएं, हिंदू देवी-देवता और विभिन्न धार्मिक प्रसंगों को बेहद बारीकी से उकेरा गया है।
इसके अलावा मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर रामायण और महाभारत से जुड़े कई प्रेरक प्रसंगों के साथ-साथ पशु-पक्षियों की सुंदर आकृतियां भी देखने को मिलती हैं।
पूरा मंदिर सुंदर शिल्पकला से सुसज्जित
हाटकेश्वर महादेव मंदिर गुजरात की ऐतिहासिक मंदिर स्थापत्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। मंदिर के विन्यास में गर्भगृह, अंतराल, सभामंडप और तीन श्रृंगार चौकियां शामिल हैं।
मंदिर के मंडोवर, पीठ, मंडप और श्रृंगार चौकियों की वेदिकाओं पर नवग्रहों, दिक्पालों और विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं। इसके अलावा कृष्ण और पांडवों के जीवन से जुड़े प्रसंग भी पत्थरों पर दिखाई देते हैं।
मत्स्य अवतार विष्णु की अनोखी प्रतिमा
मंदिर की नक्काशी में भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस प्रतिमा में सिर से जांघ तक का हिस्सा मानव रूप में है, जबकि उसके नीचे का हिस्सा मछली के आकार का है। भगवान विष्णु की चार भुजाओं में विभिन्न आयुध दर्शाए गए हैं। ऊपरी दाहिने हाथ में गदा और बाएं हाथ में चक्र है, जबकि नीचे के हाथों में शंख और पद्म के साथ वरद मुद्रा दिखाई देती है।
मंदिर की वास्तुकला और प्राचीनता
मंदिर का सभामंडप और श्रृंगार चौकियां गुंबदों से ढकी हुई हैं। गर्भगृह के ऊपर बने शिखर की प्रत्येक दिशा में तीन-तीन उरुशृंग दिखाई देते हैं।
मंदिर परिसर में कई छोटी-बड़ी देवड़ियां भी मौजूद हैं। इतिहास के दौरान मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार किया गया है। इसकी वर्तमान स्थापत्य शैली को सामान्यतः 15वीं सदी के बाद का नहीं माना जाता।
वडनगर के अधिकांश प्रमुख मंदिरों की तरह यह मंदिर नगर के बीचोंबीच नहीं, बल्कि गांव की सीमा से बाहर स्थित है। मंदिर का यह स्थान भी इसकी विशिष्टताओं में से एक माना जाता है।



