
Waste Management of India: अगर एक विशाल तराजू पर करीब 37,000 हाथियों को एक साथ खड़ा किया जाए, तो उनका कुल वजन जितना होगा, भारत में लगभग उतना ही कचरा हर दिन पैदा होता है। घरों, दफ्तरों, बाजारों और संस्थानों से निकलने वाला यह कचरा आखिर जाता कहां है? क्या इसका वैज्ञानिक तरीके से निपटारा हो रहा है और पर्यावरण पर इसका कितना असर पड़ रहा है?
देश में तेजी से बढ़ते कचरे के संकट को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया है। आइए समझते हैं कि भारत में हर दिन कितना कचरा पैदा होता है, उसका निपटारा कैसे किया जाता है और आने वाले वर्षों में देश के सामने क्या चुनौतियां होंगी।
भारत में हर दिन कितना कचरा पैदा होता है?
तेजी से हो रहे शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण भारत में कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है। PIB के आंकड़ों के अनुसार:
- शहरों में हर दिन करीब 1.62 लाख टन ठोस कचरा पैदा होता है।
- हर दिन करीब 743 टन बायो-मेडिकल वेस्ट उत्पन्न होता है।
- देश में हर साल करीब 13.97 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा होता है।
- हर साल करीब 41.36 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है।
- हर साल करीब 6.88 करोड़ टन खाद्य पदार्थ बर्बाद होते हैं।
CPCB के आंकड़े और भी चिंताजनक
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार देश में हर दिन करीब 1,85,195 टन कचरा पैदा हो रहा है।
इसमें से करीब 1,79,479 टन कचरा एकत्रित किया जाता है। एकत्रित कचरे में से लगभग 1,14,110 टन का प्रसंस्करण होता है, जबकि करीब 39,629 टन कचरा सीधे लैंडफिल में भेज दिया जाता है।
इन आंकड़ों के आधार पर बड़ी मात्रा में कचरे के उचित निपटारे को लेकर सवाल खड़े होते हैं। यदि प्रतिदिन पैदा होने वाले 1,85,195 टन कचरे की तुलना की जाए तो यह करीब 37,000 एशियाई हाथियों के वजन के बराबर बैठता है।
सुप्रीम कोर्ट ने Bulk Waste Generators पर सख्ती की
बढ़ते कचरा संकट को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने Solid Waste Management Rules 2026 के क्रियान्वयन को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कचरे के निपटारे की जिम्मेदारी केवल नगर निगमों की नहीं है। बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वाली संस्थाओं और कंपनियों को भी इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने देश के जिला कलेक्टरों को अगले छह सप्ताह में Bulk Waste Generators (BWG) की पहचान करने का निर्देश दिया है।
यदि कोई संस्था कचरा प्रबंधन के नियमों का पालन नहीं करती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर ऐसी संस्थाओं के बिजली और पानी के कनेक्शन काटने तक का प्रावधान लागू किया जा सकता है।
Bulk Waste Generator में कौन शामिल होगा?
1 अप्रैल 2026 से लागू नए नियमों के तहत बड़े कचरा उत्पादकों की स्पष्ट श्रेणी तय की गई है। इनमें ऐसी संस्थाएं शामिल हैं:
- जिनका फ्लोर एरिया 20,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक हो।
- जहां रोजाना 40,000 लीटर से ज्यादा पानी इस्तेमाल होता हो।
- जहां प्रतिदिन 100 किलो या उससे अधिक कचरा पैदा होता हो।
इसमें बड़े सरकारी और निजी कार्यालय, सरकारी कंपनियां, व्यावसायिक इमारतें और बड़ी हाउसिंग सोसायटियां शामिल हो सकती हैं।
इन संस्थाओं को अपने परिसर में ही कचरे को अलग करने, उसके संग्रह और वैज्ञानिक निपटारे की व्यवस्था करनी होगी।
वर्षों से जमा कचरा यानी Legacy Waste भी बड़ी समस्या
हर दिन पैदा होने वाला कचरा एक चुनौती है, लेकिन वर्षों से डंपसाइट्स पर जमा Legacy Waste उससे भी बड़ी समस्या बन चुका है।
PIB के अनुसार देश में करीब 2,479 ऐसी डंपसाइट्स हैं जहां 1,000 टन या उससे अधिक पुराना कचरा जमा है। इन जगहों पर कुल करीब 25 करोड़ मीट्रिक टन कचरा जमा होने का अनुमान है।
इस कचरे ने करीब 15,000 एकड़ जमीन को घेर रखा है। इन कचरे के पहाड़ों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है और जहरीला लीचेट जमीन तथा भूजल को प्रदूषित कर सकता है।
सरकार की दोहरी रणनीति
कचरा संकट से निपटने के लिए सरकार मुख्य रूप से दो स्तरों पर काम कर रही है:
पहला — पुराने कचरे के पहाड़ों को हटाना।
दूसरा — नए कचरे के लिए वैज्ञानिक प्रोसेसिंग और मैनेजमेंट सिस्टम तैयार करना।
देश में फिलहाल बड़ी संख्या में डंपसाइट्स पर पुराने कचरे को हटाने और जमीन को पुनः उपयोग में लाने का काम चल रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में 26 राज्यों के 438 शहरों में 459 डंपसाइट्स को पूरी तरह साफ किया गया और करीब 1.83 करोड़ मीट्रिक टन कचरा हटाया गया।
मई 2026 तक डंपसाइट्स की सफाई के जरिए करीब 9,000 एकड़ जमीन को कचरे से मुक्त किए जाने का दावा किया गया है।
कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण में सुधार
पिछले एक दशक में कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण में भी वृद्धि हुई है। PIB के अनुसार, 2014 में जहां करीब 16% कचरे का प्रसंस्करण होता था, वहीं मई 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 81% हो गया।
शहरों में डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण की व्यवस्था भी काफी विस्तारित हुई है। स्वच्छ भारत मिशन के आंकड़ों के मुताबिक करीब 97% शहरी वार्डों में घर-घर से कचरा संग्रहण की व्यवस्था लागू है।
इंदौर मॉडल क्यों है खास?
कचरा प्रबंधन के मामले में इंदौर देश के लिए एक उदाहरण बन चुका है। शहर में घर-घर से कचरा संग्रहण, कचरे का पृथक्करण और उसके वैज्ञानिक प्रसंस्करण पर जोर दिया गया है।
पुरानी डंपसाइट्स को साफ करके वहां हरित क्षेत्र विकसित किए गए हैं। कचरे से बायो-CNG और खाद बनाने की दिशा में भी काम किया गया है।
इसी तरह के मॉडल को दूसरे शहर भी अपनाकर कचरे को संसाधन में बदलने और Zero Waste की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
आने वाले वर्षों में और बढ़ेगा कचरा
कचरा प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था में सुधार के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती आने वाले वर्षों में कचरे की बढ़ती मात्रा है।
अनुमान के मुताबिक भारत में 2030 तक हर साल करीब 16.5 करोड़ टन कचरा पैदा हो सकता है। 2050 तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 43.6 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है।
इसलिए केवल डंपसाइट्स बढ़ाना समाधान नहीं है। कचरे को स्रोत पर ही अलग करना, रीसाइक्लिंग बढ़ाना, जैविक कचरे का वैज्ञानिक निपटारा और कचरा पैदा होने की मात्रा कम करना जरूरी होगा।
कचरा प्रबंधन सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख यह स्पष्ट करता है कि कचरा प्रबंधन केवल नगर निगम या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। आम नागरिकों, बड़ी सोसायटियों, कंपनियों और संस्थानों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
गीला और सूखा कचरा अलग करना, प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करना, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना और कचरा खुले में न फेंकना जैसे छोटे कदम भी इस समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।



