
Gujarat Industrial Crisis: गुजरात में औद्योगिक विकास को लेकर राज्य सरकार के दावों पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये वाइब्रेंट गुजरात समिट और विदेशी दौरों पर खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर छोटे उद्योगों की स्थिति लगातार खराब हो रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच गुजरात में करीब 42.17 लाख उद्योग दर्ज किए गए, जिसके आधार पर गुजरात नए उद्योगों के पंजीकरण के मामले में देश के कई बड़े राज्यों से पीछे दिखाई देता है।
विपक्ष का आरोप है कि वाइब्रेंट गुजरात समिट में बड़े निवेश और रोजगार के जो दावे किए जाते हैं, उनमें से बड़ी संख्या के MOU वास्तविक परियोजनाओं में तब्दील नहीं हो पाए हैं। इसके चलते वाइब्रेंट गुजरात के जरिए पेश किए जा रहे औद्योगिक विकास के मॉडल पर सवाल उठ रहे हैं।
अमेरिका-कनाडा दौरों पर खर्च, छोटे उद्योगों की हालत खराब
विपक्ष ने मुख्यमंत्री और अधिकारियों के हालिया अमेरिका-कनाडा दौरों को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा है। आरोप लगाया गया है कि विदेश यात्राओं पर सरकारी धन खर्च करने के बजाय यही संसाधन गुजरात के छोटे उद्योगों और बंद हो रही फैक्ट्रियों को राहत देने में लगाए जाते तो स्थिति बेहतर हो सकती थी।
दावा है कि गुजरात में करीब 12 हजार छोटे कारखाने और औद्योगिक इकाइयां बंद होने की स्थिति में हैं। विपक्ष के मुताबिक, इन छोटे उद्योगों से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है और इनके संकट का सीधा असर स्थानीय रोजगार तथा व्यापार पर पड़ रहा है।
महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य गुजरात से आगे
पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों की तुलना में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गुजरात की तुलना में अधिक उद्योग दर्ज किए गए हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:
- महाराष्ट्र: 97.19 लाख उद्योग
- उत्तर प्रदेश: 86.42 लाख उद्योग
- तमिलनाडु: 60.93 लाख उद्योग
- पश्चिम बंगाल: 53.63 लाख उद्योग
- गुजरात: 42.17 लाख उद्योग
इन आंकड़ों को आधार बनाकर विपक्ष ने गुजरात सरकार के औद्योगिक विकास के दावों पर सवाल उठाए हैं।
वाइब्रेंट गुजरात के MOU पर भी उठे सवाल
वाइब्रेंट गुजरात समिट के दौरान सरकार की ओर से हर बार बड़े निवेश प्रस्तावों और हजारों करोड़ रुपये के MOU की घोषणा की जाती रही है। हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि इनमें से कई समझौते जमीन पर वास्तविक उद्योग और रोजगार पैदा करने में सफल नहीं हुए।
विपक्ष के अनुसार, केवल निवेश के प्रस्ताव और MOU की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। जब तक प्रस्तावित परियोजनाएं वास्तव में स्थापित नहीं होतीं और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा नहीं करतीं, तब तक इन आंकड़ों को औद्योगिक विकास का वास्तविक पैमाना नहीं माना जा सकता।
क्या गुजरात के औद्योगिक मॉडल पर गंभीर सवाल?
आलोचकों का कहना है कि गुजरात की पहचान लंबे समय से देश के प्रमुख औद्योगिक राज्यों में रही है, लेकिन छोटे और मध्यम उद्योगों के सामने बढ़ती चुनौतियां चिंता का विषय हैं। उनका आरोप है कि सरकार बड़े निवेश और ब्रांडिंग पर अधिक जोर दे रही है, जबकि छोटे उद्योगों, रोजगार और स्थानीय कारोबार को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही।
हालांकि, सरकार की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया और आंकड़ों की विस्तृत व्याख्या अलग से महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों और विपक्ष के आरोपों ने गुजरात के औद्योगिक विकास मॉडल को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।



