
Potato Farmers vs Contract Farming Companies: उत्तर गुजरात में ठेका खेती के तहत आलू की खेती करने वाले किसानों और निजी कंपनियों के बीच विवाद अब गंभीर होता जा रहा है। किसानों का आरोप है कि शुरुआती वर्षों में कंपनियों के साथ समझौते के तहत खेती करने पर अच्छा मुनाफा मिलता था, लेकिन अब कंपनियों की कथित मनमानी और एकतरफा शर्तों के कारण उनका भरोसा टूट रहा है।
साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर तालुका के ग्रामीण इलाकों में किसान अब एकजुट होने लगे हैं। किसानों द्वारा रात में सभाएं और खाटला बैठकें आयोजित की जा रही हैं। इन बैठकों में निजी कंपनियों के खिलाफ आंदोलन की रणनीति पर चर्चा की जा रही है।
100 किलो आलू पर 1.6 किलो की कथित कटौती
किसानों का सबसे बड़ा आरोप आलू की तौल और भुगतान में होने वाली कथित कटौती को लेकर है। किसानों के मुताबिक, कंपनियां हर 100 किलो आलू पर 1 किलो 600 ग्राम तक की कटौती कर रही हैं।
किसानों का सवाल है कि यह कटौती किस नियम के तहत की जाती है और इसका आधार क्या है, इसकी स्पष्ट जानकारी उन्हें नहीं दी जाती। इसके अलावा, वाहनों में आलू की बोरियां या माल चढ़ाने के लिए लगने वाले मजदूरी खर्च का भुगतान भी कंपनियों द्वारा नहीं किए जाने का आरोप लगाया गया है।
किसानों का कहना है कि इससे खेती की वास्तविक लागत बढ़ जाती है और पहले से दबाव में चल रहे परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
महंगाई बढ़ी, लेकिन किसानों को मिल रहा कम भाव
आलू की खेती में डीजल, रासायनिक खाद और कीटनाशकों की लागत लगातार बढ़ने के बावजूद किसानों का कहना है कि कंपनियां पहले से तय कम कीमत पर ही उपज खरीदती हैं।
किसानों का आरोप है कि कई बार प्रतिकूल मौसम या प्राकृतिक परिस्थितियों का हवाला देकर तय भुगतान में भी कटौती कर दी जाती है। इससे किसानों के लिए आलू की खेती आर्थिक रूप से मुश्किल होती जा रही है।
किसानों का कहना है कि जब उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, तब कम खरीद मूल्य और अतिरिक्त कटौती के कारण उनकी वास्तविक आय और घट जाती है।
अंग्रेजी में अनुबंध, किसानों के सामने कानूनी परेशानी
स्थानीय किसान नेताओं ने अनुबंध की भाषा को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कई निजी कंपनियों द्वारा किसानों के साथ किए जाने वाले अनुबंध दस्तावेज केवल अंग्रेजी भाषा में तैयार किए जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के कई किसान जटिल कानूनी और व्यावसायिक अंग्रेजी शर्तों को पूरी तरह समझ नहीं पाते। ऐसे में वे कंपनी पर भरोसा करके दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते हैं।
किसान नेताओं का आरोप है कि बाद में इन्हीं शर्तों के आधार पर कंपनियां कटौती या अन्य फैसले करती हैं, जिससे किसान खुद को कानूनी रूप से कमजोर स्थिति में पाते हैं।
हालांकि, कंपनियों पर लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कंपनियों का पक्ष इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।
आंदोलन की तैयारी में जुटे किसान
किसानों का कहना है कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही खाटला बैठकों के जरिए किसानों को एकजुट करने और निजी कंपनियों की कथित मनमानी के खिलाफ सामूहिक आवाज उठाने की तैयारी की जा रही है।
अब किसानों की मांग है कि अनुबंध की शर्तों को पारदर्शी बनाया जाए, फसल की तौल और भुगतान व्यवस्था स्पष्ट हो तथा किसानों पर होने वाली कथित अनधिकृत कटौती को रोका जाए।



