
Asia Economic Crisis Warning: एशियाई बाजारों में हाल के दिनों में जारी उतार-चढ़ाव के बीच HSBC के मुख्य अर्थशास्त्री फ्रेडरिक न्यूमैन ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं को लेकर चेतावनी दी है। उनके मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में एशिया के सामने ऐसा जोखिम उभर रहा है, जिसकी तुलना 1997 के एशियाई आर्थिक संकट से की जा सकती है।
हालांकि, न्यूमैन का आकलन यह नहीं है कि 1997 जैसा संकट निश्चित रूप से आने वाला है। उन्होंने मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और उस समय के घटनाक्रमों के बीच कुछ महत्वपूर्ण समानताओं की ओर इशारा करते हुए संभावित जोखिमों को समझने की जरूरत बताई है।
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और कमजोर येन से बढ़ी चिंता
31 अगस्त की एक टिप्पणी में फ्रेडरिक न्यूमैन ने एशियाई बाजारों में बढ़ती अस्थिरता पर चर्चा की। CNBC की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि और जापानी येन की कमजोरी को महत्वपूर्ण संकेतों के तौर पर देखा है।
उनका कहना है कि आज का जोखिम 1990 के दशक की कमजोर बैंकिंग व्यवस्था से अलग है। अब एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की एक बड़ी चिंता अमेरिकी तकनीकी कंपनियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जुड़े निवेश पर बढ़ती निर्भरता है।
AI पर अत्यधिक निर्भरता बन सकती है बड़ा जोखिम
न्यूमैन के अनुसार, एशिया के कई प्रमुख निर्यात आधारित देशों की आर्थिक वृद्धि में अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के AI बुनियादी ढांचे पर बढ़ते खर्च की महत्वपूर्ण भूमिका है।
दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाएं इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और तकनीकी उत्पादों के निर्यात से काफी हद तक जुड़ी हैं।
ऐसे में यदि अमेरिका की बड़ी तकनीकी कंपनियां डेटा सेंटर और AI बुनियादी ढांचे पर अपना खर्च कम करती हैं, तो इसका असर एशियाई कंपनियों के ऑर्डर और निर्यात पर पड़ सकता है।
1997 में क्या हुआ था?
1997 के एशियाई आर्थिक संकट से पहले कई एशियाई देश विदेशी पूंजी पर काफी निर्भर थे। स्थानीय निवेश और आर्थिक विस्तार के लिए विदेशी बचत का इस्तेमाल किया जा रहा था। इसके चलते कई देशों में चालू खाते का घाटा और वित्तीय प्रणाली की कमजोरियां बढ़ गई थीं।
जब वैश्विक स्तर पर उधार लेने की लागत बढ़ी और निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ, तो विदेशी पूंजी तेजी से इन अर्थव्यवस्थाओं से बाहर निकलने लगी। इसका गंभीर असर थाईलैंड, दक्षिण कोरिया और क्षेत्र के अन्य देशों पर पड़ा।
हालांकि, आज स्थिति काफी अलग है। एशिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब विदेशी पूंजी की बड़ी आयातक होने के बजाय पूंजी निर्यातक हैं और उनके पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार भी है।
इस बार संकट का स्वरूप अलग हो सकता है
फ्रेडरिक न्यूमैन के मुताबिक, आज एशिया के सामने 1997 जैसी वित्तीय असुरक्षा से ज्यादा मांग से जुड़ा जोखिम है।
यदि अमेरिकी तकनीकी कंपनियां AI और डेटा सेंटर पर खर्च घटाती हैं, तो इसका असर सीधे एशिया के सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग पर पड़ सकता है।
इसके अलावा अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में लगातार बढ़ोतरी और जापानी येन में तेज उतार-चढ़ाव वैश्विक वित्तीय बाजारों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।
येन की कमजोरी भी चिंता का संकेत
न्यूमैन ने मुद्रा बाजार में हुए बदलाव को भी महत्वपूर्ण बताया है। उनके अनुसार, 1995 से 1997 के बीच जापानी येन में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारी गिरावट आई थी। आज भी येन में काफी कमजोरी देखी गई है।
हालांकि, केवल मुद्रा में गिरावट को 1997 जैसे संकट का संकेत मानना उचित नहीं होगा। मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, एशियाई देशों की वित्तीय स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार उस दौर से काफी अलग हैं।
अगर AI निवेश घटा तो एशिया पर सीधा असर
सबसे बड़ा जोखिम उस स्थिति में पैदा हो सकता है जब अमेरिका की बड़ी तकनीकी कंपनियां बढ़ती ब्याज दरों या महंगे कर्ज के कारण डेटा सेंटर और AI बुनियादी ढांचे पर खर्च कम कर दें।
ऐसी स्थिति में इसका असर पहले सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीकी सामान के ऑर्डर पर दिखाई दे सकता है। यानी संकट की शुरुआत बैंकों में अचानक घबराहट से होने के बजाय कंपनियों की ऑर्डर बुक और निर्यात मांग में गिरावट के रूप में सामने आ सकती है।
इसलिए न्यूमैन की चेतावनी का मुख्य संदेश यह है कि एशिया को केवल पारंपरिक वित्तीय संकट के संकेतों पर नजर नहीं रखनी चाहिए, बल्कि AI निवेश चक्र और अमेरिकी मांग पर अपनी बढ़ती निर्भरता से पैदा होने वाले जोखिमों को भी गंभीरता से देखना चाहिए।



