अब आबादी बढ़ना नहीं, घटती जनसंख्या बनेगी बड़ी चुनौती! भारत समेत कई देशों के लिए चेतावनी

The Shrinking World Challenge: दशकों तक दुनिया को बढ़ती आबादी और संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को लेकर चेताया जाता रहा। लेकिन अब वैश्विक जनसंख्या की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। कई देशों में जन्मदर लगातार घट रही है और कुछ देश अपनी जनसंख्या के उच्चतम स्तर को पार कर चुके हैं। ऐसे में आने वाले दशकों में घटती आबादी और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी दुनिया के सामने एक नई आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन सकती है।

संयुक्त राष्ट्र और ‘अवर वर्ल्ड इन डेटा’ के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के कई देशों और क्षेत्रों में जनसंख्या अब अपने चरम पर पहुंच चुकी है। दूसरी ओर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे कुछ देशों में अभी भी आबादी बढ़ रही है। सवाल यह है कि अगर कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या घटने लगे तो अर्थव्यवस्था, रोजगार, पेंशन और स्वास्थ्य व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा? आइए समझते हैं।

64 देशों और क्षेत्रों में आबादी घटने की शुरुआत

दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां जनसंख्या अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है और अब उसमें गिरावट का दौर शुरू हो गया है। इस सूची में केवल छोटे देश ही नहीं, बल्कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं।

  • चीन: दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल चीन अपनी जनसंख्या के चरम को पार कर चुका है और अब वहां आबादी घट रही है।
  • दक्षिण कोरिया: यहां जन्मदर दुनिया में सबसे कम स्तरों में है। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दशकों में आबादी में भारी कमी आ सकती है।
  • जापान, ताइवान, हांगकांग और थाईलैंड: इन क्षेत्रों में भी कम जन्मदर और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी बड़ी चुनौती बन रही है।
  • यूरोप: इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रिया समेत कई देशों में जनसंख्या वृद्धि धीमी पड़ चुकी है या आबादी घट रही है।
  • पूर्वी यूरोप: पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे देशों में कम जन्मदर के साथ युवाओं का दूसरे देशों में पलायन भी जनसंख्या घटने की समस्या को बढ़ा रहा है।

जापान में बच्चों से ज्यादा बुजुर्गों की चिंता

जापान घटती जन्मदर और वृद्ध होती आबादी का प्रमुख उदाहरण है। देश में बुजुर्गों की संख्या बढ़ने के साथ सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है।

कम बच्चों के कारण कई इलाकों में स्कूलों को बंद करना पड़ा है। आबादी के तेजी से बुजुर्ग होने का असर बाजार पर भी दिखाई देता है और बच्चों से जुड़ी वस्तुओं की तुलना में बुजुर्गों के लिए आवश्यक उत्पादों की मांग बढ़ रही है।

आखिर क्यों घट रही है आबादी?

घटती आबादी का कारण केवल युद्ध, महामारी या प्राकृतिक आपदा नहीं है। इसके पीछे समाज और अर्थव्यवस्था में आए बड़े बदलाव भी जिम्मेदार हैं।

किसी देश की आबादी को लंबे समय तक लगभग स्थिर रखने के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 बच्चे प्रति महिला मानी जाती है। लेकिन दुनिया के कई देशों में यह दर इससे काफी नीचे जा चुकी है।

महंगाई और बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च

बड़े शहरों में घर, शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों की परवरिश का खर्च लगातार बढ़ा है। ऐसे में कई दंपतियों के लिए दो या तीन बच्चों की जिम्मेदारी उठाना आर्थिक रूप से कठिन होता जा रहा है।

महिलाओं की शिक्षा और करियर

महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ शादी और मातृत्व की उम्र भी कई देशों में बढ़ी है। बड़ी संख्या में महिलाएं करियर को प्राथमिकता दे रही हैं और कुछ लोग कम बच्चे पैदा करने या बच्चे न पैदा करने का व्यक्तिगत निर्णय ले रहे हैं।

ब्राजील और मैक्सिको भी पहुंचेंगे आबादी के चरम पर

संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, आज जिन देशों में आबादी अभी बढ़ रही है, उनमें से कई आने वाले दशकों में अपने जनसंख्या चरम पर पहुंच सकते हैं।

ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेंटीना जैसे देशों के बारे में अनुमान है कि वे 2050 के आसपास या उससे पहले अपनी जनसंख्या के उच्चतम स्तर तक पहुंच सकते हैं। इसके बाद वहां भी आबादी में गिरावट शुरू होने की संभावना है।

भारत का भविष्य क्या होगा?

भारत फिलहाल दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। लेकिन भारत में भी जन्मदर में गिरावट जारी है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक, भारत की आबादी 2060 के दशक में करीब 1.7 अरब के आसपास अपने चरम पर पहुंच सकती है। इसके बाद इसमें धीरे-धीरे कमी आने का अनुमान है।

इसका मतलब है कि भारत के पास अपनी बड़ी युवा आबादी का आर्थिक लाभ उठाने के लिए सीमित समय है। शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना आने वाले वर्षों में बेहद महत्वपूर्ण होगा।

अमेरिका को इमिग्रेशन से मिल रहा सहारा

अमेरिका में भी जन्मदर कम है, लेकिन वहां आप्रवासन (इमिग्रेशन) आबादी की स्थिति को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

दूसरे देशों से बड़ी संख्या में लोग अमेरिका में आकर काम और स्थायी निवास हासिल करते हैं। इससे कामकाजी उम्र की आबादी को सहारा मिलता है और कम जन्मदर के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

2084 के बाद दुनिया की आबादी घट सकती है

वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, दुनिया की कुल आबादी 2080 के दशक के मध्य में करीब 10.3 अरब के आसपास अपने चरम पर पहुंच सकती है। इसके बाद वैश्विक आबादी में गिरावट शुरू होने का अनुमान है।

यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो मानव इतिहास में पहली बार वैश्विक आबादी लंबे समय तक घटने के दौर में प्रवेश कर सकती है।

घटती आबादी से कौन-कौन सी मुश्किलें आएंगी?

पहली नजर में कम आबादी अच्छी लग सकती है, क्योंकि इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन आर्थिक दृष्टि से घटती आबादी कई गंभीर समस्याएं भी पैदा कर सकती है।

1. कामकाजी लोगों की कमी

युवा आबादी घटने से कंपनियों और उद्योगों को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में रोबोटिक्स, स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल तेजी से बढ़ सकता है।

2. पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव

काम करने और कर चुकाने वाले लोगों की संख्या कम होगी, जबकि बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इससे पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर सरकारों का खर्च बढ़ सकता है।

3. आप्रवासन की भूमिका बढ़ेगी

जिन देशों में युवा कामगारों की कमी होगी, वे दूसरे देशों से कुशल और युवा लोगों को आकर्षित करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे में भविष्य में प्रतिभाशाली युवाओं के लिए देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है।

4. भारत और अफ्रीका के लिए अवसर की आखिरी बड़ी खिड़की

भारत और अफ्रीका के कई देशों के पास अभी बड़ी युवा आबादी है। आने वाले दो-तीन दशकों में यदि इन देशों ने युवाओं को अच्छी शिक्षा, कौशल और पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराया, तो यह युवा आबादी आर्थिक विकास की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

लेकिन यदि रोजगार और उत्पादकता नहीं बढ़ी, तो यही बड़ी आबादी भविष्य में तेजी से वृद्ध होती आबादी में बदल सकती है।

अब कई सरकारें ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दे रही हैं

21वीं सदी में जनसंख्या नीति का रुख कई देशों में बदल रहा है। जहां पहले सरकारें जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने पर जोर देती थीं, वहीं अब कम जन्मदर वाले देश लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए आर्थिक और सामाजिक प्रोत्साहन देने लगे हैं।

जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और रूस जैसे देशों में बच्चों वाले परिवारों के लिए विभिन्न प्रकार की आर्थिक सहायता, कर राहत, आवास संबंधी सुविधाएं और शिक्षा सहायता जैसी नीतियां अपनाई गई हैं।

भारत में भी कुछ राज्य घटती जन्मदर को लेकर नई नीतियों पर विचार कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में जनसंख्या प्रबंधन को लेकर परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने संबंधी नीतिगत पहल की चर्चा हुई है। हालांकि, किसी भी राज्य की योजना के वास्तविक प्रावधान और लाभों को आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर अलग से देखना जरूरी है।

निष्कर्ष: आबादी कम होना अपने आप में समस्या नहीं, तैयारी की कमी समस्या बन सकती है

दुनिया जिस जनसांख्यिकीय बदलाव की ओर बढ़ रही है, उसमें चुनौती केवल यह नहीं होगी कि लोगों की संख्या कम हो रही है। असली सवाल यह होगा कि कम युवा आबादी के साथ अर्थव्यवस्था कैसे चलेगी और बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतें कैसे पूरी होंगी।

भारत के लिए यह स्थिति एक चेतावनी के साथ बड़ा अवसर भी है। आने वाले 20-30 वर्षों में शिक्षा, कौशल, रोजगार, स्वास्थ्य और उत्पादकता पर सही निवेश किया गया तो भारत अपनी युवा आबादी को आर्थिक ताकत में बदल सकता है। अन्यथा, जनसांख्यिकीय लाभ भविष्य में जनसांख्यिकीय बोझ में बदल सकता है।