
Gujarat Police: गुजरात पुलिस का आधिकारिक नारा है—‘सेवा, सुरक्षा और शांति’। लेकिन राज्य में पुलिस बल की तैनाती को लेकर अब एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। आरोप है कि आम नागरिकों को सुरक्षा देने के लिए पुलिस बल की कमी का हवाला दिया जाता है, जबकि निजी कंपनियों और संस्थाओं के लिए भुगतान के आधार पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है।
सरकार की ‘ऑन पेमेंट पुलिस बंदोबस्त नीति’ के तहत निजी पक्षों को पुलिस सुरक्षा और बंदोबस्त उपलब्ध कराया जाता है। विधानसभा में पूछे गए एक लिखित सवाल के जवाब में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, केवल कच्छ और सुरेंद्रनगर जिलों में ही पुलिस बंदोबस्त के बदले 2.59 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बकाया है।
1999 के पुराने प्रस्ताव के आधार पर चल रही व्यवस्था
इस व्यवस्था के लिए सरकार 1 अक्टूबर 1999 के प्रस्ताव का आधार ले रही है। इसके तहत निजी कंपनियों या अन्य निजी पक्षों की मांग पर भुगतान के आधार पर पुलिस बंदोबस्त उपलब्ध कराया जाता है।
हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर सवाल यह उठ रहा है कि जब आम नागरिक अपने क्षेत्र में चोरी, असामाजिक तत्वों या सुरक्षा संबंधी समस्याओं से परेशान होकर पुलिस सुरक्षा की मांग करते हैं, तब कई बार उन्हें पुलिस बल की कमी का हवाला दिया जाता है। ऐसे में निजी परियोजनाओं और कंपनियों के लिए भुगतान के आधार पर पुलिस बल की तैनाती को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुरेंद्रनगर में 2 करोड़ से ज्यादा की रकम बकाया
सरकार द्वारा विधानसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, सुरेंद्रनगर जिले में पुलिस बंदोबस्त के बदले 2.02 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अभी तक बकाया है।
वहीं, सीमावर्ती और संवेदनशील जिले कच्छ में 57,50,596 रुपये की राशि बकाया बताई गई है। दोनों जिलों को मिलाकर यह रकम 2.59 करोड़ रुपये से अधिक हो जाती है।
पुलिस सुरक्षा के बदले भुगतान, फिर वसूली में ढिलाई क्यों?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल बकाया राशि की वसूली को लेकर उठ रहा है। आम नागरिकों से सरकारी बकाया की वसूली के लिए प्रशासन सख्त कार्रवाई करता है, लेकिन निजी पक्षों से पुलिस बंदोबस्त की राशि लंबे समय तक बकाया रहने पर कार्रवाई की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं।
विपक्ष और आलोचकों की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि पुलिस का प्राथमिक दायित्व जनता की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, ऐसे में निजी संस्थाओं के लिए भुगतान के आधार पर पुलिस बल की तैनाती की सीमा और प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
सरकार के आंकड़ों ने एक ओर भुगतान के आधार पर पुलिस बंदोबस्त की व्यवस्था को सामने रखा है, वहीं दूसरी ओर बकाया राशि की वसूली को लेकर भी प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं।



