गुजरात में पंचायतों पर बढ़ा पानी का कर्ज, ₹236 करोड़ का पानी कर बकाया

Gujarat Local Bodies Crisis: गुजरात में स्थानीय स्वशासी संस्थाओं की आर्थिक स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। नगरपालिकाओं की वित्तीय परेशानियों के बाद अब ग्राम पंचायतों पर भी पानी के बकाया बिल का बोझ बढ़ता नजर आ रहा है। सरकारी रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, ग्राम पंचायतों पर पानी कर की बकाया राशि बढ़कर ₹236 करोड़ से अधिक हो गई है।

राज्य सरकार ग्रामीण क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने के लिए हर साल बड़ी राशि खर्च करती है, लेकिन पानी कर की कमजोर वसूली के कारण स्थानीय संस्थाओं पर बकाया बढ़ता जा रहा है। इससे राज्य सरकार और स्थानीय निकायों के बीच वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

पांच साल में पंचायतों ने सिर्फ ₹52 लाख पानी कर जमा किया

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों के दौरान पंचायतों की ओर से पानी कर के रूप में महज ₹52 लाख जमा किए गए। इसके मुकाबले बकाया राशि लगातार बढ़ती गई।

आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2019-20 में पंचायतों पर पानी कर के रूप में करीब ₹139 करोड़ बकाया था। वर्ष 2023-24 तक यह राशि बढ़कर ₹236 करोड़ तक पहुंच गई।

रिपोर्ट में कमजोर वसूली को बकाया बढ़ने की प्रमुख वजहों में से एक बताया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बकाया राशि में करीब ₹74.44 करोड़ की वृद्धि हुई है।

चुनाव और स्थानीय राजनीति से वसूली प्रभावित होने का दावा

स्थानीय स्तर पर कर वसूली को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों की चर्चा भी होती रही है। आरोप है कि पंचायतें और स्थानीय निकाय जनता से कर वसूलने में सख्ती से बचते हैं, क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर असंतोष पैदा होने की आशंका रहती है।

हालांकि, यह एक राजनीतिक विश्लेषण है और इसे सरकारी रिपोर्ट के आंकड़ों से अलग देखा जाना चाहिए। बकाया पानी कर की वसूली को लेकर सरकार की ओर से क्या ठोस कार्रवाई की जाती है, यह आगे महत्वपूर्ण रहेगा।

नगरपालिकाओं पर भी ₹148 करोड़ से अधिक का पानी बिल बकाया

ग्राम पंचायतों के साथ-साथ गुजरात की नगरपालिकाओं पर भी पानी के बिल का बड़ा बकाया बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नगरपालिकाओं पर ₹148 करोड़ से अधिक का पानी बिल बकाया है।

इस स्थिति ने राज्य की स्थानीय स्वशासी संस्थाओं की वित्तीय क्षमता और कर वसूली व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। यदि बकाया राशि की समय पर वसूली नहीं होती है, तो स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति पर इसका असर पड़ सकता है।

स्थानीय संस्थाओं की आय, कर वसूली और सरकारी अनुदान के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय में सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है।