
Uttarakhand Glacier Retreat: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने को लेकर नई वैज्ञानिक समीक्षा ने चिंता बढ़ा दी है। डिस्कवर जियोसाइंस में प्रकाशित समीक्षा के अनुसार, उत्तराखंड के मध्य हिमालय के 23 प्रमुख ग्लेशियरों में कुल मिलाकर 25,621.01 मीटर यानी करीब 25.6 किलोमीटर का संचयी पीछे हटना दर्ज किया गया है। यह आंकड़ा अलग-अलग अध्ययनों में दर्ज ग्लेशियरों के अग्रभाग के पीछे खिसकने को जोड़कर सामने आया है।
यह समीक्षा देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों, क्षेत्रीय सर्वेक्षणों, उपग्रह तस्वीरों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल समेत विभिन्न आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है। अध्ययन में 1990 से 2024 के बीच प्रकाशित शोधों को शामिल किया गया।
खातलिंग ग्लेशियर सबसे तेजी से पीछे हटने वालों में
अध्ययन के अनुसार, टिहरी गढ़वाल का खातलिंग ग्लेशियर उत्तराखंड के सबसे तेजी से पीछे हटने वाले ग्लेशियरों में शामिल है। वर्ष 1965 से 2014 के बीच इसके पीछे हटने की औसत दर करीब 88 मीटर प्रति वर्ष रही।
इस अवधि में खातलिंग ग्लेशियर लगभग 4.34 किलोमीटर पीछे खिसका और इसके कारण यह बड़े हिमखंड से छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो गया।
अन्य ग्लेशियरों में भी पीछे हटने की अलग-अलग दर दर्ज की गई है। पिंडारी ग्लेशियर के लिए 2000-2018 के दौरान करीब 45.8 मीटर प्रति वर्ष, मिलाम के लिए 1972-2018 के दौरान 37.8 मीटर प्रति वर्ष और गंगोत्री ग्लेशियर के लिए 1935-2004 के दौरान करीब 22 मीटर प्रति वर्ष की दर दर्ज की गई।
सभी ग्लेशियर एक ही गति से नहीं पिघल रहे
वैज्ञानिक समीक्षा में यह भी सामने आया है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने की गति हर जगह समान नहीं है। तापमान और वर्षा जैसे जलवायु कारकों के साथ-साथ ग्लेशियर की ऊंचाई, ढलान, आकार, दिशा और बर्फ की सतह पर जमा मलबा भी इसके पीछे हटने की गति को प्रभावित करता है।
विशेष रूप से सुप्राग्लेशियल मलबा कुछ परिस्थितियों में बर्फ को बाहरी गर्मी से बचाने वाली परत का काम कर सकता है और सतह के पिघलने की गति को कम कर सकता है। इसलिए केवल तापमान के आधार पर हर ग्लेशियर के पीछे हटने की गति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
ग्लेशियरों के पीछे हटने से क्यों बढ़ती है चिंता?
हिमालयी ग्लेशियर नदियों के जलप्रवाह और पर्वतीय क्षेत्रों की जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। ग्लेशियरों में लगातार बदलाव से भविष्य में पानी की उपलब्धता, कृषि, जलविद्युत और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, केवल इस अध्ययन के आधार पर किसी निश्चित क्षेत्र में तत्काल बाढ़ या आपदा की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। अध्ययन मुख्य रूप से ग्लेशियरों के पीछे हटने की दीर्घकालिक स्थिति और उसके कारणों को समझने पर केंद्रित है।
देश में कमजोर मानसून ने भी बढ़ाई चिंता
इसी बीच, इस साल देश में मानसून वर्षा सामान्य से कम रही है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के मानसून आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 18 सितंबर 2026 के बीच देश में 691.9 मिमी बारिश दर्ज हुई, जबकि सामान्य बारिश 812.1 मिमी होती है। यानी बारिश में करीब 14.8 प्रतिशत की कमी रही।
रिपोर्टों के अनुसार, 16 राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है और ये राज्य देश के करीब 43 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र को कवर करते हैं। कम बारिश से कृषि उत्पादन और आने वाले महीनों में जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
हालांकि, कम मानसून और उत्तराखंड के ग्लेशियर पीछे हटने की घटनाओं को सीधे एक-दूसरे का कारण मानना उचित नहीं होगा। दोनों अलग-अलग पर्यावरणीय और जलवायु संकेतक हैं, जिनका प्रभाव क्षेत्र और समय के अनुसार अलग हो सकता है।
नई वैज्ञानिक समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड के ग्लेशियरों में बदलाव एक समान नहीं है, लेकिन कई प्रमुख ग्लेशियरों के पीछे हटने की दीर्घकालिक प्रवृत्ति हिमालयी पर्यावरण में हो रहे बदलावों को समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती है।



