
अहमदाबाद: डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों और खासकर वरिष्ठ नागरिकों से होने वाली बड़ी साइबर ठगी को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच और कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। डिजिटल अरेस्ट से जुड़े एक मामले में आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस निखिल एस. करियेल ने राज्य पुलिस और साइबर अपराध विभाग की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा कि पुलिस को केवल जागरूकता और दावों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ठगी के शिकार वरिष्ठ नागरिकों की रकम वापस दिलाने और मुख्य आरोपियों तक पहुंचने के लिए परिणाम देने वाली कार्रवाई करनी चाहिए।
‘पुलिस खुद साइबर अपराध को कितनी समझती है?’
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि पुलिस अक्सर वरिष्ठ नागरिकों को साइबर ठगी के प्रति जागरूक नहीं होने की बात कहती है, लेकिन क्या साइबर पुलिस स्वयं ऐसे अपराधों की कार्यप्रणाली को पर्याप्त रूप से समझती है?
अदालत ने यह भी पूछा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में ठगी का शिकार हुए कितने वरिष्ठ नागरिकों को उनकी रकम वापस मिल पाई है। अदालत के सवालों का केंद्र यह भी रहा कि पुलिस अक्सर छोटे स्तर पर इस्तेमाल किए गए म्यूल बैंक खातों के धारकों को गिरफ्तार करने तक कार्रवाई सीमित क्यों रखती है और मुख्य संचालकों तक क्यों नहीं पहुंच पाती।
60 लाख रुपये की ठगी, फिर भी रकम वापस नहीं
मामले में शिकायतकर्ता के साथ डिजिटल अरेस्ट के नाम पर करीब 60 लाख रुपये की ठगी होने की बात सामने आई। इसके बावजूद पीड़ित को अभी तक पूरी रकम वापस नहीं मिली है और मुख्य आरोपी तक भी पुलिस नहीं पहुंच सकी है।
अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि गिरफ्तार किए गए एक आरोपी के किराये पर दिए गए बैंक खाते से करीब 10 लाख रुपये बरामद किए गए हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि जब आरोपी बरामद रकम शिकायतकर्ता को वापस करने के लिए तैयार है, तो पुलिस पीड़ित को रकम वापस दिलाने की दिशा में कदम क्यों नहीं उठा रही है।
मुख्य आरोपी तक नहीं पहुंचने पर भी सवाल
मामले में मोहम्मद दानिश नामक मुख्य आरोपी का उल्लेख भी सामने आया। आरोप है कि डिजिटल अरेस्ट के जरिए ठगी गई रकम को अन्य सह-आरोपियों के म्यूल बैंक खातों में स्थानांतरित किया जाता था।
हाईकोर्ट ने इस पहलू पर भी सवाल उठाया कि यदि जांच में मुख्य आरोपी और रकम के लेनदेन से संबंधित जानकारी सामने आ चुकी है, तो पुलिस अभी तक उसके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं कर सकी।
बैंक खातों की भूमिका पर भी अदालत की नजर
सुनवाई के दौरान म्यूल बैंक खातों के इस्तेमाल और बैंकिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी से जुड़े सवाल भी उठे। अदालत के समक्ष यह मुद्दा आया कि जिन बैंक खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम जमा करने और आगे भेजने के लिए किया जाता है, उन्हें खोलते समय केवाईसी प्रक्रिया और बैंक अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए।
सामान्य बैंक खातों के लिए केवाईसी अनिवार्य होने के बावजूद यदि खाते साइबर अपराधों में इस्तेमाल हो रहे हैं, तो संबंधित बैंकिंग प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच का सवाल उठता है।
हाईकोर्ट ने कार्रवाई को परिणाम आधारित बनाने पर दिया जोर
अदालत की टिप्पणियों का मुख्य केंद्र यह रहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों में केवल म्यूल खातों के धारकों तक कार्रवाई सीमित रखने के बजाय मुख्य आरोपियों तक पहुंचना और पीड़ितों की रकम की रिकवरी भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
डिजिटल अरेस्ट के मामलों में अपराधी आमतौर पर पुलिस, जांच एजेंसी या न्यायिक अधिकारी बनकर पीड़ितों को डराते हैं और वीडियो कॉल या अन्य डिजिटल माध्यमों से उन्हें अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में समय पर बैंकिंग लेनदेन रोकना और रकम की रिकवरी महत्वपूर्ण हो सकती है।
नोट: हाईकोर्ट की टिप्पणियां मामले की सुनवाई के दौरान सामने आईं हैं। बैंक अधिकारियों या अन्य व्यक्तियों की किसी कथित मिलीभगत को अदालत द्वारा दोष सिद्ध किया गया है, ऐसा इस खबर के आधार पर नहीं कहा जा सकता।



