अहमदाबाद में नई तकनीक से सिर्फ 2 घंटे में भरेंगे सड़क के गड्ढे, समय बचेगा लेकिन बढ़ेगी लागत

Ahmedabad News: अहमदाबाद में अब कंक्रीट सड़कों के गड्ढों और क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत पहले की तुलना में काफी तेजी से की जा सकेगी। अहमदाबाद महानगरपालिका (AMC) ने सड़क मरम्मत के लिए जियोपॉलिमर तकनीक अपनाने का निर्णय लिया है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक तरीके की तरह सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया जाता और मरम्मत के बाद सड़क को करीब दो घंटे में यातायात के लिए खोला जा सकता है।

शहर के छह क्षेत्रों में कंक्रीट सड़कों की मरम्मत के लिए इस नई तेजी से जमने वाली तकनीक को मंजूरी दी गई है। इसके लिए साढ़े पांच करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाने का प्रावधान है।

जियोपॉलिमर तकनीक कैसे काम करती है?

जियोपॉलिमर तकनीक में सीमेंट की जगह औद्योगिक उप-उत्पादों को बांधने वाले पदार्थ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसमें थर्मल पावर प्लांट में कोयला जलने से निकलने वाली राख तथा उद्योगों से प्राप्त सिलिका और एल्युमिनियम युक्त पदार्थों का उपयोग किया जाता है।

इन सामग्रियों से तैयार मिश्रण को जियोपॉलिमर कहा जाता है। इसमें पानी मिलाकर इसे सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्से या गड्ढे में भरकर मरम्मत की जाती है।

फिलहाल अहमदाबाद में इस तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से कंक्रीट सड़कों की मरम्मत के लिए किया जाएगा। सीजी रोड, बोडकदेव, वस्त्रापुर और मणिनगर सहित शहर के विभिन्न इलाकों में बनी कंक्रीट सड़कों के क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत में इसका उपयोग किया जा सकता है।

समय और पानी की होगी बचत

सामान्य सड़क मरम्मत की तुलना में जियोपॉलिमर तकनीक की लागत कुछ अधिक बताई जा रही है। हालांकि, इसके इस्तेमाल से मरम्मत का समय काफी कम हो सकता है।

नई तकनीक से मरम्मत किए गए हिस्से को लंबे समय तक सूखने या जमने के लिए बंद रखने की जरूरत नहीं होगी। करीब दो घंटे बाद सड़क को यातायात के लिए खोला जा सकेगा।

इसके अलावा मरम्मत के बाद लगातार पानी का छिड़काव करने की आवश्यकता भी नहीं होती। इससे पानी और समय दोनों की बचत होने का दावा किया गया है।

कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद

AMC के रोड एंड बिल्डिंग्स विभाग के अनुसार, मुंबई के ईस्टर्न और वेस्टर्न एक्सप्रेसवे सहित कुछ अन्य शहरों में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

सीमेंट के स्थान पर औद्योगिक उप-उत्पादों के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही मरम्मत के दौरान मलबे और कंकड़-पत्थर के इस्तेमाल को कम करने से पर्यावरणीय प्रभाव भी घटने की उम्मीद है।

बारिश के मौसम में भी तेजी से हो सकेगी मरम्मत

इस तकनीक का एक प्रमुख लाभ यह माना जा रहा है कि मानसून के दौरान भी सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्सों की तेजी से मरम्मत की जा सकेगी। दो घंटे में सड़क खोलने की क्षमता के कारण लंबे समय तक यातायात बाधित होने की समस्या कम हो सकती है।

फिलहाल इसका इस्तेमाल कंक्रीट सड़कों तक सीमित रहेगा। भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर डामर की सड़कों की मरम्मत में भी इस तकनीक के इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है।