
अहमदाबाद में सुभाष ब्रिज की जगह नए ब्रिज के निर्माण को लेकर विवाद गहरा गया है। अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (AMC) की जनरल बोर्ड बैठक में विपक्ष ने करीब 241 करोड़ रुपये के स्वीकृत प्रोजेक्ट को लेकर जमकर सवाल उठाए। विपक्ष का आरोप है कि निर्माण कार्य दिनेशचंद्र आर. अग्रवाल इंफ्राकॉन नाम की कंपनी को दिया गया है, जिसे कथित तौर पर गांधीनगर GIDC ने 20 साल के लिए डिबार किया था।
डिबार कंपनी को काम देने पर विपक्ष के सवाल
विपक्षी पार्षदों ने सवाल उठाया कि यदि कंपनी पहले किसी सरकारी एजेंसी द्वारा प्रतिबंधित की गई थी, तो उसे सिंगल टेंडर के जरिए इतना बड़ा प्रोजेक्ट कैसे सौंपा गया? विपक्ष ने टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया कि पूरी प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई।
विपक्ष का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण ब्रिज का निर्माण किसी ऐसी कंपनी को सौंपने से पहले उसके पुराने रिकॉर्ड और पात्रता की विस्तृत जांच होनी चाहिए थी।
241 करोड़ का प्रोजेक्ट 300 करोड़ तक पहुंचने का दावा
विपक्ष ने यह भी आशंका जताई कि ब्रिज निर्माण की लागत आगे बढ़कर करीब 300 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि ठेकेदार को अधिक लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से मौजूदा ब्रिज को तोड़कर नया निर्माण कराने का फैसला लिया गया।
हालांकि, सत्ताधारी पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि फिलहाल प्रोजेक्ट की स्वीकृत लागत 241 करोड़ रुपये ही है।
सत्ताधारी पक्ष ने किया बचाव
AMC स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि ब्रिज निर्माण में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रोजेक्ट वर्तमान में स्वीकृत राशि के अनुसार ही आगे बढ़ाया जा रहा है।
डिबार कंपनी के रिकॉर्ड पर भी सवाल
विपक्ष का कहना है कि यदि संबंधित कंपनी के खिलाफ पहले डिबार किए जाने का रिकॉर्ड मौजूद है, तो AMC के इंजीनियरिंग विभाग को इसकी जानकारी होनी चाहिए थी। दूसरी ओर, इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों ने ऐसी किसी जानकारी या रिकॉर्ड से अनभिज्ञता जताई है।
इसके बाद विपक्ष ने नगर आयुक्त से पूरे मामले की जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
जनरल बोर्ड के एजेंडे को लेकर भी विवाद
विपक्षी पार्षदों का एक और गंभीर आरोप है कि सुभाष ब्रिज से जुड़ी यह प्रस्तावित कार्रवाई जनरल बोर्ड के एजेंडे में शामिल ही नहीं थी। विपक्ष के अनुसार, निर्णय स्टैंडिंग कमेटी के स्तर पर लिया गया, जबकि संबंधित कंपनी द्वारा पिछले करीब दो महीनों से काम शुरू किए जाने का भी दावा किया जा रहा है।
अब इस पूरे मामले में टेंडर प्रक्रिया, कंपनी की पात्रता, डिबार रिकॉर्ड और काम शुरू करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। विपक्ष ने मामले में पारदर्शी जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग की है।



