
हाईकोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लिया, महाराष्ट्र सरकार से नियमों और उनके पालन की जानकारी मांगी
Bombay High Court on Noise Pollution: गणेशोत्सव के दौरान तेज आवाज में बजने वाले डीजे, लाउडस्पीकर और अन्य साउंड सिस्टम से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका शुरू की है। न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार से ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले कानूनों और उनके जमीनी स्तर पर पालन की जानकारी मांगी है।
‘हम किसी धर्म या त्योहार के खिलाफ नहीं’
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि उसे धार्मिक आयोजनों या त्योहारों से कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, अदालत ने कहा कि त्योहार मनाने का अधिकार दूसरे नागरिकों के अधिकारों और शांतिपूर्ण वातावरण के अधिकार की कीमत पर नहीं हो सकता।
अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि निर्धारित मानकों से अधिक तेज आवाज में संगीत और अन्य ध्वनि उपकरणों के इस्तेमाल से आम नागरिकों, बच्चों, विद्यार्थियों और बुजुर्गों को परेशानी हो सकती है।
सरकार से नियमों और कार्रवाई का ब्योरा मांगा
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और निगरानी से जुड़े मौजूदा कानूनों की जानकारी मांगी है। साथ ही यह भी बताने को कहा गया है कि इन नियमों को लागू करने के लिए प्रशासन और पुलिस की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि नियमों का उल्लंघन करने वाले डीजे, लाउडस्पीकर और साउंड सिस्टम के खिलाफ पिछले और मौजूदा गणेशोत्सव के दौरान कितनी कार्रवाई की गई।
आधी रात तक लाउडस्पीकर की अनुमति पर सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब सामान्य नियमों के तहत रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर और एम्प्लीफायर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है, तो कुछ आयोजनों को आधी रात तक ध्वनि उपकरण इस्तेमाल करने की अनुमति किस आधार पर दी जाती है।
अदालत ने विशेष अनुमति देने की प्रक्रिया और उसके कानूनी आधार को स्पष्ट करने को कहा है। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने त्योहारों के दौरान निर्धारित समय-सीमा और ध्वनि मानकों के पालन को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
त्योहार मनाने के साथ नियमों का पालन जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक जुलूस और त्योहार मनाए जा सकते हैं, लेकिन आयोजनों के दौरान निर्धारित ध्वनि मानकों और अन्य कानूनी नियमों का पालन जरूरी है। अदालत का जोर इस बात पर है कि नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका प्रभावी तरीके से जमीन पर भी पालन हो।
अब महाराष्ट्र सरकार और संबंधित प्रशासन को अदालत के समक्ष यह बताना होगा कि ध्वनि प्रदूषण रोकने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है। मामले की अगली कार्यवाही में अदालत सरकार की ओर से दी गई जानकारी पर विचार करेगी।



