100 साल का सबसे खतरनाक अल-नीनो? वैज्ञानिकों की चेतावनी, भारत पर पड़ेगा बड़ा असर

El Niño Warning: ब्रिटेन के मौसम विभाग की एक चिंताजनक भविष्यवाणी ने अल-नीनो को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के अनुसार, मौजूदा अल-नीनो इस सदी का सबसे शक्तिशाली और पिछले करीब 100 वर्षों में सबसे गंभीर अल-नीनो साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इसके प्रभाव से 2027 में रिकॉर्डतोड़ गर्मी देखने को मिल सकती है।

प्रशांत महासागर के तापमान में भारी बढ़ोतरी

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2015 की तुलना में समुद्र का तापमान करीब 2.6 डिग्री सेल्सियस अधिक है, जो नवंबर तक बढ़कर 3.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।

वैश्विक औसत तापमान भी सामान्य स्तर से करीब 1.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर बना हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र के तापमान में इस तरह की असामान्य वृद्धि का असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है।

भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर

अल-नीनो का सबसे बड़ा असर भारत में मानसून और कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। कमजोर मानसून की स्थिति में देश में सामान्य से कम बारिश हो सकती है, जिसका सीधा असर खरीफ और आगामी रबी फसलों पर पड़ सकता है।

तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर रहने की स्थिति में गेहूं समेत प्रमुख फसलों के उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। बारिश में कमी और अत्यधिक गर्मी के कारण किसानों की लागत बढ़ने तथा कृषि उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।

2027 की गर्मी 2024 का रिकॉर्ड तोड़ सकती है

वैज्ञानिकों के अनुसार, अल-नीनो का प्रभाव आमतौर पर कई महीनों से लेकर करीब एक साल तक रह सकता है। वर्ष 2024 में भी दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड गर्मी देखने को मिली थी।

अब आशंका जताई जा रही है कि यदि मजबूत अल-नीनो विकसित होता है, तो 2027 में गर्मी का प्रकोप 2024 से भी ज्यादा गंभीर हो सकता है। इससे हीटवेव, सूखा और बारिश के पैटर्न में बदलाव जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं।

महंगाई का भी बढ़ सकता है दबाव

यदि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कृषि उत्पादन घटता है, तो खाद्यान्न और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा भी पैदा हो सकता है।

हालांकि, अल-नीनो की अंतिम तीव्रता और भारत पर उसका वास्तविक प्रभाव आने वाले महीनों में मौसम संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।