क्या विश्वयुद्ध या बड़ी आर्थिक मंदी की आहट? यूरोपीय देश सैकड़ों टन सोना क्यों स्थानांतरित कर रहे हैं?

दुनिया में बढ़ते भूराजनीतिक तनाव, व्यापारिक टकराव और आर्थिक अनिश्चितता के बीच केंद्रीय बैंक अपने स्वर्ण भंडार की रणनीति पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। कई देश अपने सोने को ऐसे स्थानों पर रखना चाहते हैं, जहां संकट के समय उसे तेजी से इस्तेमाल या बेचा जा सके।

इसी कड़ी में नीदरलैंड्स के केंद्रीय बैंक (De Nederlandsche Bank) ने मार्च से अगस्त 2026 के बीच अमेरिका और कनाडा में रखे अपने करीब 86 टन सोने को लंदन स्थानांतरित किया है। बैंक के मुताबिक, यह कदम बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच संकट से निपटने की तैयारी का हिस्सा है।

नीदरलैंड्स ने 86 टन सोना लंदन क्यों भेजा?

नीदरलैंड्स के पास अमेरिका और कनाडा में कुल करीब 313 टन सोना रखा हुआ था। इसमें से लगभग 86 टन को लंदन स्थानांतरित किया गया।

केंद्रीय बैंक का कहना है कि इसका मुख्य उद्देश्य सोने की तरलता और व्यापार योग्य क्षमता बढ़ाना है। यानी किसी गंभीर आर्थिक या वित्तीय संकट की स्थिति में इस सोने को विदेशी मुद्रा में बदलना या बाजार में इस्तेमाल करना अधिक आसान हो सके।

DNB के अनुसार, सोने के भंडार को उत्तरी अमेरिका, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स के बीच अधिक संतुलित तरीके से रखने से जोखिम भी फैलता है और संकट के समय सोने तक पहुंच बेहतर होती है।

यह कदम किसी संभावित विश्वयुद्ध की आधिकारिक भविष्यवाणी नहीं है। इसे मुख्य रूप से संकट-प्रबंधन और भंडार प्रबंधन की रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।

लंदन ही क्यों बना पसंदीदा ठिकाना?

लंदन दुनिया के भौतिक सोने के कारोबार के प्रमुख केंद्रों में से एक है। ऐसे में वहां सोना रखने से जरूरत पड़ने पर उसकी खरीद-बिक्री और विदेशी मुद्रा में रूपांतरण अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

यही वजह है कि नीदरलैंड्स ने अपने कुछ भंडार को अमेरिका और कनाडा से हटाकर लंदन पहुंचाया है। इसका उद्देश्य अमेरिकी भंडार को पूरी तरह खाली करना नहीं, बल्कि सोने के भंडारण को अलग-अलग स्थानों में संतुलित करना है।

जर्मनी भी पहले कर चुका है बड़ा स्थानांतरण

नीदरलैंड्स ऐसा करने वाला पहला यूरोपीय देश नहीं है। जर्मनी की बुंडेसबैंक ने भी वर्षों पहले विदेशों में रखे अपने सोने का एक बड़ा हिस्सा वापस फ्रैंकफर्ट लाने का फैसला किया था।

सिर्फ 2016 में जर्मनी ने विदेशों से 216 टन से अधिक सोना फ्रैंकफर्ट स्थानांतरित किया था। इसमें न्यूयॉर्क से 111 टन और पेरिस से 105 टन सोना शामिल था।

हालांकि, जर्मनी ने अपने सभी विदेशी भंडार को समाप्त नहीं किया। बुंडेसबैंक की रणनीति में घरेलू भंडारण के साथ-साथ न्यूयॉर्क और लंदन जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण व्यापार केंद्रों में भंडार रखना भी शामिल रहा है।

केंद्रीय बैंक लगातार क्यों खरीद रहे हैं सोना?

सोने की मांग केवल यूरोपीय देशों तक सीमित नहीं है। विश्व स्वर्ण परिषद (World Gold Council) के अनुसार, केंद्रीय बैंकों ने पिछले चार वर्षों में औसतन करीब 1,000 टन सोना प्रति वर्ष जमा किया है, जबकि इससे पहले के दशक में यह औसत करीब 500 टन था।

2025 में भी केंद्रीय बैंकों की शुद्ध खरीद करीब 863 टन रही। हालांकि यह 2023 और 2024 के 1,000 टन से अधिक के स्तर से कम थी, फिर भी यह 2010-2021 के करीब 473 टन के औसत से काफी ज्यादा है।

इसके पीछे कई कारण माने जाते हैं—

  • विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाना
  • डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करना
  • भू-राजनीतिक जोखिम से सुरक्षा
  • आर्थिक संकट के समय सुरक्षित संपत्ति के रूप में सोने का इस्तेमाल
  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की आसान तरलता

सोने की कीमतों में भी जबरदस्त तेजी

केंद्रीय बैंकों की मजबूत मांग के बीच सोने की कीमतों में भी तेज वृद्धि हुई है। Goldman Sachs Research ने 28 अगस्त 2026 को अनुमान लगाया कि वर्ष 2026 के अंत तक सोने की कीमत करीब 4,900 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस तक पहुंच सकती है। संस्था ने इसके पीछे केंद्रीय बैंकों की मजबूत मांग और विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने की कोशिशों को प्रमुख कारणों में शामिल किया है।

3 सितंबर को हाजिर सोने की कीमत करीब 4,488 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई थी।

तो क्या यह विश्वयुद्ध या आर्थिक मंदी का संकेत है?

सीधे तौर पर ऐसा कहना सही नहीं होगा। यूरोपीय केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने को स्थानांतरित करना किसी आगामी विश्वयुद्ध या निश्चित आर्थिक मंदी की घोषणा नहीं है।

असल में केंद्रीय बैंक बढ़ते भूराजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए अपने भंडार की ऐसी व्यवस्था करना चाहते हैं, जिससे संकट आने पर सोने का इस्तेमाल तेजी से किया जा सके।

नीदरलैंड्स का ताजा कदम इसी बदलती रणनीति का संकेत है—सोना सिर्फ सुरक्षित संपत्ति नहीं, बल्कि संकट के समय तुरंत इस्तेमाल किए जा सकने वाले रणनीतिक भंडार के रूप में भी देखा जा रहा है।