हाईकोर्ट की आंखों में धूल झोंकने का खेल? गिर में अवैध निर्माणों को पिछले दरवाजे से मंजूरी देने वाला परिपत्र

Sasan Gir Eco Sensitive Zone: सासण गिर जैसे बेहद संवेदनशील और एशियाई शेरों के एकमात्र प्राकृतिक आवास वाले इको-सेंसिटिव जोन में कथित अवैध निर्माणों को राहत देने वाले एक विवादास्पद परिपत्र को लेकर हंगामा मच गया है। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी की ओर से जारी इस पत्र को लेकर पर्यावरणविदों और वन्यजीव प्रेमियों में नाराजगी है।

सबसे गंभीर बात यह है कि गिर क्षेत्र में अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन से जुड़ा मामला पहले से गुजरात हाईकोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में अदालत की कार्यवाही के बीच वन विभाग की ओर से होटल और रिसॉर्ट संचालकों की मांगों को कथित तौर पर राहत देने वाला निर्देश जारी किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।

387 अवैध इकाइयों पर हुई थी कार्रवाई

सासण गिर के इको-सेंसिटिव जोन में कथित अवैध व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर गुजरात हाईकोर्ट पहले ही सख्त रुख अपना चुका है। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद प्रशासन ने करीब 387 अवैध होटल और रिसॉर्ट के खिलाफ सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू की थी।

इसी बीच प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. जयपाल सिंह की ओर से जूनागढ़, गिर-सोमनाथ और अमरेली के जिला कलेक्टरों को भेजे गए पत्र को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि इस कदम के जरिए अदालत की कार्रवाई के बीच कुछ निर्माणों को अप्रत्यक्ष रूप से राहत देने का रास्ता तैयार किया जा रहा है।

किन निर्माणों को लेकर उठे सवाल?

जानकारी के मुताबिक, सासण गिर होटल एसोसिएशन ने वन मंत्री के साथ बैठक के बाद मांग रखी थी कि रिसॉर्ट और होटल में बनाए जाने वाले ओपन रिसेप्शन, स्विमिंग पूल, ओपन किचन, जिम, स्टोर रूम और फैब्रिकेशन जैसे निर्माणों को मुख्य निर्माण क्षेत्र में शामिल नहीं किया जाए।

आरोप है कि इन मांगों को खारिज करने के बजाय वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने वर्ष 2015 के पुराने प्रस्ताव/निर्णय के आधार पर ऐसी सुविधाओं को मंजूरी देने की दिशा में जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इससे चौकीदार केबिन या स्टोर रूम जैसे नामों पर बड़े पैमाने पर अतिरिक्त निर्माण खड़ा करने का रास्ता खुल सकता है।

शेरों के संरक्षण पर भी उठे सवाल

गिर में व्यावसायिक गतिविधियों के विस्तार के साथ स्विमिंग पूल, स्पा, जिम और बड़े किचन जैसी सुविधाओं में वृद्धि होने से शोर, रोशनी और प्रदूषण बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, संवेदनशील वन क्षेत्र में बढ़ती मानवीय गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार और आवास पर असर डाल सकती हैं। ऐसे में एशियाई शेरों के संरक्षण और इको-सेंसिटिव जोन के नियमों के पालन को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है।

पर्यावरणविदों ने परिपत्र रद्द करने की मांग की

वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों ने विवादित परिपत्र को तत्काल वापस लेने की मांग की है। साथ ही, गुजरात हाईकोर्ट से इस मामले की गंभीरता से जांच करने और यदि अदालत के निर्देशों की अवहेलना हुई हो तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की गई है।

हालांकि, परिपत्र की कानूनी वैधता और इससे वास्तव में किन निर्माणों को मंजूरी मिल सकती है, इसका अंतिम निर्धारण संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।