धरती पर बढ़ता संकट: ग्रीनलैंड-अंटार्कटिका से 12 ट्रिलियन टन से ज्यादा बर्फ गायब, 90 लाख लोगों पर बाढ़ का खतरा

नई दिल्ली: धरती के दो प्रमुख ध्रुवीय क्षेत्र ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से पिछले कई दशकों में भारी मात्रा में बर्फ कम हुई है। Scientific Data में प्रकाशित एक नए अध्ययन के मुताबिक, 1979 से 2023 के बीच दोनों बर्फीली चादरों ने करीब 11.3 ट्रिलियन मीट्रिक टन बर्फ खोई। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में इसे लगभग 12.5 ट्रिलियन टन के रूप में भी बताया गया है। इस बर्फ के नुकसान से वैश्विक समुद्र स्तर में करीब 3.1 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई है।

27 उपग्रह अभियानों से जुटाए गए आंकड़े

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 27 अलग-अलग उपग्रह अभियानों और 45 स्वतंत्र सर्वेक्षणों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और नासा के उपग्रहों से मिले आंकड़े भी शामिल हैं।

अध्ययन ने अंटार्कटिका के लिए 1979 से और ग्रीनलैंड के लिए इससे भी पुराने रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया, जिससे कई दशकों में बर्फ की स्थिति में आए बदलाव का अधिक विस्तृत आकलन संभव हुआ।

समुद्र का स्तर 3.1 सेंटीमीटर बढ़ा

वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से बर्फ के नुकसान ने 1979 से वैश्विक समुद्र स्तर को लगभग 3.1 सेंटीमीटर बढ़ाने में योगदान दिया है। यह वृद्धि समुद्र के स्तर को प्रभावित करने वाले अन्य जलवायु कारकों के अतिरिक्त है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र स्तर में प्रत्येक 1 सेंटीमीटर की वृद्धि से दुनिया भर में लगभग 20 से 30 लाख अतिरिक्त लोग ऐसे हो सकते हैं, जिन्हें हर साल कम से कम एक बार बाढ़ का सामना करना पड़े। इस हिसाब से 3.1 सेंटीमीटर की वृद्धि करीब 60 से 90 लाख लोगों के वार्षिक बाढ़ जोखिम से जुड़ सकती है। यह आंकड़ा वैश्विक स्तर पर बढ़ते समुद्री जोखिम को समझाने के लिए इस्तेमाल किया गया है।

बर्फ सिर्फ गर्म हवा से नहीं पिघल रही

अध्ययन की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि बर्फ के नुकसान का बड़ा हिस्सा केवल वातावरण के गर्म होने से सतह पर बर्फ पिघलने के कारण नहीं हुआ। शोध के अनुसार, करीब पांच-छठे हिस्से का नुकसान गर्म समुद्री पानी के कारण ग्लेशियरों के नीचे और किनारों से बर्फ के क्षरण तथा ग्लेशियरों के तेजी से समुद्र की ओर बहने से जुड़ा है।

इसका मतलब है कि ध्रुवीय बर्फ की चादरों में होने वाले बदलाव केवल सतही पिघलाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्लेशियरों की गति और समुद्र के साथ उनकी परस्पर क्रिया भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

2010 के दशक में बढ़ी बर्फ खोने की रफ्तार

अध्ययन के आंकड़ों से पता चलता है कि 1970 और 1980 के दशक में दोनों बर्फीली चादरों में बदलाव अपेक्षाकृत सीमित था। इसके बाद बर्फ के नुकसान की गति बढ़ी और 2010 के दशक में इसमें काफी तेजी देखी गई।

2020 से 2023 के बीच कुछ अवधि में बर्फ के नुकसान की रफ्तार में अस्थायी कमी भी देखी गई। वैज्ञानिकों ने इसे अल्पकालिक मौसम संबंधी बदलावों से जोड़ा है, न कि बर्फ के नुकसान की दीर्घकालिक प्रवृत्ति के समाप्त होने से।

तटीय शहरों के लिए बढ़ती चुनौती

ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से बर्फ के नुकसान का असर केवल ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। समुद्र स्तर बढ़ने के साथ दुनिया के तटीय और निचले इलाकों में बाढ़ तथा तटीय क्षरण का जोखिम बढ़ता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दशकों में समुद्र स्तर में होने वाली वृद्धि तटीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को और बढ़ा सकती है। इसलिए लंबे समय तक समुद्र स्तर में होने वाले बदलावों की निगरानी और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के उपाय महत्वपूर्ण होंगे।