47 वर्षों में ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से गायब हुई 12.5 ट्रिलियन टन बर्फ, गर्म समुद्री पानी बना बड़ी चुनौती

बर्फ पिघलने से समुद्र का जलस्तर करीब 3.1 सेंटीमीटर बढ़ा, तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ने की चेतावनी

Greenland Iceberg: एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, 1979 के बाद से ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ की चादरों से करीब 12.5 ट्रिलियन टन बर्फ कम हो चुकी है। यह इतनी बड़ी मात्रा है कि इससे पूरे अमेरिका को करीब डेढ़ मीटर मोटी बर्फ की परत से ढका जा सकता है।

अध्ययन के मुताबिक, बर्फ के नुकसान का करीब 5-6 प्रतिशत हिस्सा सीधे गर्म हवा के बजाय गर्म समुद्री पानी से जुड़ा है। गर्म समुद्री पानी बर्फ की चादरों को नीचे और समुद्र की ओर वाले किनारों से तेजी से कमजोर कर रहा है। बर्फ के पिघलने और समुद्र में पहुंचने के कारण वैश्विक समुद्री जलस्तर में करीब 3.1 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है।

2000 और 2010 के दशक में तेजी से बढ़ी बर्फ पिघलने की रफ्तार

वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलता है कि हाल के दशकों में बर्फ की चादरों के पिघलने की गति में उल्लेखनीय तेजी आई है। 1970 और 1980 के दशक तथा 1990 के दशक की शुरुआत तक बर्फ की चादरों में बदलाव अपेक्षाकृत सीमित था। इसके बाद 2000 के दशक और खासकर 2010 के दशक में बर्फ के नुकसान की गति तेज होती गई।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु गर्म होने के प्रभावों के प्रति बर्फ की चादरों की प्रतिक्रिया धीमी होती है। इसलिए वैश्विक तापमान भविष्य में स्थिर होने के बाद भी बर्फ की चादरों में बदलाव कई दशकों तक जारी रह सकता है।

हर 1 सेंटीमीटर समुद्र स्तर बढ़ने से लाखों लोगों पर असर

समुद्र के बढ़ते जलस्तर का सबसे सीधा असर तटीय क्षेत्रों में रहने वाली आबादी पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार, समुद्र के जलस्तर में प्रत्येक 1 सेंटीमीटर की वृद्धि से हर साल कम से कम 20 से 30 लाख अतिरिक्त लोगों के लिए बाढ़ का जोखिम पैदा हो सकता है।

ग्रीनलैंड का जैकबशावन ग्लेशियर दुनिया के तेजी से बदल रहे ग्लेशियरों में शामिल है। अध्ययन में तेजी से बर्फ खो रहे ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों को लेकर विशेष चिंता जताई गई है।

45 स्वतंत्र सर्वे और 27 उपग्रहों के आंकड़ों का विश्लेषण

शोध में 45 स्वतंत्र सर्वेक्षणों और 27 उपग्रह मिशनों से प्राप्त आंकड़ों को मिलाकर बर्फ की चादरों में लंबे समय के बदलाव का रिकॉर्ड तैयार किया गया।

2020 से 2023 के बीच बर्फ के नुकसान की गति में कुछ कमी दर्ज की गई, लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार यह मुख्य रूप से अस्थायी मौसमी परिस्थितियों का परिणाम थी। इसे बर्फ पिघलने की दीर्घकालिक प्रवृत्ति में स्थायी बदलाव नहीं माना जा रहा है।

तेजी से पिघलते ग्लेशियर वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय

वैज्ञानिक विशेष रूप से उन ग्लेशियरों को लेकर चिंतित हैं जो तेजी से समुद्र की ओर बर्फ पहुंचा रहे हैं। इससे बर्फ की चादरों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है और कुछ परिस्थितियों में ऐसे बदलाव शुरू हो सकते हैं जिन्हें रोकना या उलटना बेहद कठिन हो।

अंटार्कटिका में कुछ क्षेत्रों में भारी बर्फबारी से बर्फ के नुकसान की आंशिक भरपाई होती है, लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार दीर्घकालिक तस्वीर में बर्फ की कुल हानि और समुद्री जलस्तर बढ़ने का जोखिम स्पष्ट बना हुआ है। इसका असर आने वाले समय में दुनिया के तटीय इलाकों और वहां रहने वाली आबादी पर पड़ सकता है।