गुजरात में खेती पर संकट: 2.28 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि घटी, किसान खेती छोड़ने को मजबूर

Gujarat Agricultural Land Decline: गुजरात में तेजी से हो रहे औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के बीच कृषि भूमि को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। लोकसभा में पेश किए गए Land Use Statistics के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में राज्य में करीब 2.28 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि कम हुई है। यह राज्य के कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 1.83 प्रतिशत है। कृषि लागत बढ़ने और खेती से अपेक्षित आमदनी नहीं होने के कारण कई किसान अपनी जमीन बेचने को मजबूर हो रहे हैं।

पांच साल में 2.24 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि कम

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020-21 में गुजरात में 124.62 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि थी। वर्ष 2024-25 तक यह घटकर करीब 122.38 लाख हेक्टेयर रह गई।

जिलेवार स्थिति देखें तो कृषि भूमि में कमी के मामले में साबरकांठा, जामनगर और वडोदरा प्रमुख जिलों में शामिल हैं। वहीं अहमदाबाद जिले में बड़ी मात्रा में जमीन गैर-कृषि उपयोग में परिवर्तित हुई है।

तेजी से बढ़ता शहरीकरण बना बड़ा कारण

कृषि भूमि घटने के पीछे तेजी से हो रहा शहरी विस्तार एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वडोदरा जैसे शहरों की सीमाएं लगातार फैल रही हैं। नए आवासीय प्रोजेक्ट, औद्योगिक क्षेत्र, हाईवे और लॉजिस्टिक पार्क के विस्तार के कारण कृषि भूमि का इस्तेमाल गैर-कृषि गतिविधियों के लिए किया जा रहा है।

कई जगह किसानों को जमीन की ऊंची कीमत मिलने के कारण जमीन बेचने का विकल्प आकर्षक लगता है। वहीं दूसरी ओर खेती की बढ़ती लागत और सीमित आय ने भी किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ाया है।

कृषि भूमि घटने के पीछे ये प्रमुख वजहें

  • तेजी से बढ़ता शहरीकरण
  • औद्योगिक कॉरिडोर और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं
  • खेती की बढ़ती लागत और कम मुनाफा
  • समुद्री इलाकों में बढ़ती मिट्टी की लवणता
  • भूमि कटाव और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट
  • कृषि भूमि का गैर-कृषि उपयोग में परिवर्तन

बढ़ती लागत ने किसानों की मुश्किलें बढ़ाईं

बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ने के बावजूद किसानों को कई फसलों का पर्याप्त भाव नहीं मिल पाता। ऐसे में खेती से होने वाली आय और खर्च के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में नई पीढ़ी भी खेती के बजाय दूसरे रोजगार और व्यवसायों की ओर बढ़ रही है। इससे आने वाले समय में कृषि क्षेत्र में श्रम और खेती दोनों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

तटीय क्षेत्रों में खारापन भी बड़ी चुनौती

कच्छ और सूरत सहित गुजरात के कई तटीय इलाकों में जमीन में बढ़ती लवणता कृषि के लिए गंभीर चुनौती बन रही है। इसके अलावा भूमि के अत्यधिक दोहन और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से भी मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होने की चिंता जताई जाती है।

कृषि भूमि घटने का सिलसिला नहीं रुका तो बढ़ेगा संकट

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि भूमि के गैर-कृषि उपयोग में बदलने का सिलसिला इसी तरह जारी रहा, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और खाद्य सुरक्षा पर भी दबाव बढ़ सकता है।

छोटे किसान जमीन बेचने के बाद खेती से बाहर होते गए तो उनके लिए स्थायी आजीविका का संकट भी खड़ा हो सकता है। ऐसे में गुजरात में औद्योगिक और शहरी विकास के साथ कृषि भूमि के संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय की बड़ी चुनौती होगी।