
शादी होने या राजस्व रिकॉर्ड से नाम हटाए जाने मात्र से किसान परिवार की बेटी का किसान का दर्जा खत्म नहीं हो सकता
अहमदाबाद: महिलाओं के संपत्ति अधिकार और किसान के कानूनी दर्जे को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति दिव्येश ए. जोशी की पीठ ने कहा कि किसान परिवार में जन्मी बेटी का विवाह हो जाने या उसके नाम को राजस्व रिकॉर्ड से हटा दिए जाने मात्र से उसका किसान का दर्जा समाप्त नहीं होता।
अदालत ने पोरबंदर कलेक्टर के 19 अगस्त 2016 के आदेश को रद्द करते हुए आवेदक महिला के नाम से संबंधित 26 मई 1990 की राजस्व प्रविष्टियों को बहाल करने का आदेश दिया।
बेटी को भी पैतृक संपत्ति में अधिकार
अदालत ने अपने फैसले में हिंदू उत्तराधिकार कानून में हुए संशोधनों का उल्लेख करते हुए कहा कि बेटी को भी पिता की संपत्ति में सह-उत्तराधिकारी के रूप में अधिकार प्राप्त है।
अदालत के अनुसार, केवल राजस्व रिकॉर्ड से किसी महिला का नाम हटा दिए जाने से उसका किसान का दर्जा समाप्त नहीं हो जाता, खासकर तब जब रिकॉर्ड से नाम हटाने की प्रक्रिया में धोखाधड़ी का आरोप हो।
किसान परिवार में जन्म के आधार पर दर्जा
अदालत ने पाया कि आवेदक के परिवार की कृषि भूमि का संबंध उसके दादा और पिता से था। उसके दादा किसान थे और उनकी कृषि भूमि उनके तीन बेटों के बीच विभाजित हुई थी, जिनमें आवेदक के पिता भी शामिल थे।
इस आधार पर अदालत ने माना कि आवेदक किसान की बेटी और किसान की पोती होने के कारण किसान परिवार से संबंधित थी। केवल बाद में उसका नाम राजस्व रिकॉर्ड से कथित रूप से हटा दिए जाने के कारण उसके किसान के दर्जे को समाप्त नहीं माना जा सकता।
किसान प्रमाणपत्र को भी माना महत्वपूर्ण
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित महिला को स्थानीय तलाटी-कम-मंत्री द्वारा रिकॉर्ड की जांच के बाद किसान प्रमाणपत्र जारी किया गया था।
अदालत के अनुसार, उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि महिला ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किसान का दर्जा हासिल किया था। अदालत ने माना कि वह मूल रूप से किसान परिवार से संबंधित थी।
भाई पर रिकॉर्ड से नाम हटाने का आरोप
मामला राजकोट जिले के जामकंडोरणा तालुका के जसपर गांव से जुड़ा था। याचिकाकर्ता जसुमतीबेन के पिता नाथालाल का 1967 में निधन हुआ था। आरोप था कि इसके बाद उनके भाई रमेश ने कथित रूप से धोखाधड़ी और दस्तावेजों के माध्यम से राजस्व रिकॉर्ड से उनका नाम हटवा दिया।
बाद में जसुमतीबेन ने अपने परिवार की कृषि भूमि से संबंधित किसान प्रमाणपत्र के आधार पर वर्ष 1990 में कृषि भूमि खरीदी थी।
हालांकि, बाद में तीसरे पक्ष ने आपत्ति उठाते हुए कहा कि मूल भूमि रिकॉर्ड में उनका नाम नहीं था और इसलिए उन्हें किसान नहीं माना जा सकता। इसके बाद राजस्व अधिकारियों ने मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए संबंधित भूमि लेनदेन की प्रविष्टियों को रद्द कर दिया।
इसी कार्रवाई के खिलाफ उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया था।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
अदालत ने मामले में कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर टिप्पणी की:
- किसान की बेटी होने मात्र से महिला का किसान का दर्जा विवाह के बाद समाप्त नहीं हो जाता।
- राजस्व रिकॉर्ड से नाम हटाए जाने मात्र से किसान का दर्जा खत्म नहीं किया जा सकता।
- वर्ष 1990 की प्रविष्टियों के खिलाफ करीब 19 वर्ष बाद स्वतः संज्ञान लेकर पुनरीक्षण अधिकार का इस्तेमाल किया गया।
- कानून में स्पष्ट समयसीमा नहीं होने के बावजूद पुनरीक्षण अधिकार का इस्तेमाल उचित समयावधि के भीतर किया जाना चाहिए।
- अंतिम निर्णय से पहले यदि कानून में बदलाव हुआ हो तो संबंधित पक्षों को उस बदलाव पर अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए।
- पक्ष को उचित अवसर दिए बिना संशोधित कानूनी प्रावधान के आधार पर निर्णय लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकता है।
- हिंदू उत्तराधिकार कानून में हुए संशोधनों के तहत बेटी को भी पिता की संपत्ति में सह-उत्तराधिकारी का अधिकार प्राप्त है।
कलेक्टर का पुराना आदेश रद्द
मामले के सभी तथ्यों और रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने 19 अगस्त 2016 के कलेक्टर के आदेश को रद्द कर दिया और आवेदक महिला के नाम से संबंधित 26 मई 1990 की राजस्व प्रविष्टियों को बहाल करने का निर्देश दिया।
अदालत के इस फैसले में किसान परिवार की बेटियों के अधिकार, राजस्व रिकॉर्ड में नाम और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर विचार किया गया है।



