
Gujarat Education Amendment Bill: गुजरात सरकार वर्ष 1972 के गुजरात माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा अधिनियम में कई महत्वपूर्ण बदलाव करने जा रही है। इसके लिए संशोधन विधेयक विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा। प्रस्तावित विधेयक में बिना पंजीकरण स्कूल चलाने, बोर्ड की पूर्व अनुमति के बिना स्कूल बंद करने और नियमों का उल्लंघन कर शिक्षकों की नियुक्ति करने जैसे मामलों में जुर्माने और सजा के प्रावधानों को काफी सख्त किया गया है।
विधेयक विधानसभा से पारित होकर लागू होने के बाद प्रस्तावित नई व्यवस्थाएं प्रभावी हो जाएंगी।
बिना पंजीकरण स्कूल चलाने पर ₹15 लाख तक जुर्माना और जेल
प्रस्तावित संशोधन में बिना गुजरात माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में पंजीकरण कराए स्कूल चलाने वाले संचालकों पर ₹10 लाख से ₹15 लाख तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है। इसके साथ 1 से 2 वर्ष तक की जेल की सजा भी हो सकती है।
मौजूदा व्यवस्था में ऐसे मामलों में केवल ₹1 लाख से ₹2 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है और जेल की सजा का प्रावधान नहीं था।
इसके अलावा नियमों का उल्लंघन करते हुए आचार्य या शिक्षकों की नियुक्ति करने पर भी जुर्माने में भारी बढ़ोतरी प्रस्तावित है। यह राशि ₹10 हजार से बढ़ाकर ₹10 लाख की जा सकती है।
बिना पूर्व मंजूरी स्कूल बंद किया तो ₹20 लाख तक का जुर्माना
प्रस्तावित संशोधन का सबसे अहम प्रावधान स्कूल बंद करने से जुड़ा है। नियमों के अनुसार किसी स्कूल को बंद करने के लिए संचालक को बोर्ड को छह महीने पहले सूचना देकर पूर्व अनुमति लेनी होती है।
यदि कोई संचालक आवश्यक सूचना या अनुमति के बिना स्कूल बंद करता है, तो प्रस्तावित संशोधन के तहत उस पर ₹20 लाख तक का जुर्माना और जेल की सजा हो सकती है। मौजूदा व्यवस्था में इसके लिए केवल ₹1,000 के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है।
शिक्षकों और कर्मचारियों को भी संरक्षण
संशोधन विधेयक में स्कूल के शिक्षकों और कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान भी प्रस्तावित हैं।
इसके तहत स्कूल प्रबंधन किसी शिक्षक या आचार्य को उचित कारण के बिना निलंबित नहीं कर सकेगा। ऐसे मामलों में बोर्ड को निर्धारित प्रक्रिया के तहत 45 दिनों के भीतर निर्णय लेना होगा।
विधेयक में बोर्ड के निर्वाचित सदस्यों से संबंधित कुछ प्रावधानों में भी बदलाव किए जाने की बात कही गई है।
अनुदान प्राप्त स्कूलों में लिपिक भर्ती की जिम्मेदारी सरकार के पास
कक्षा 9 से 12 तक के अनुदान प्राप्त स्कूलों में आचार्य और शिक्षकों की भर्ती के लिए सरकार पहले ही केंद्रीकृत व्यवस्था लागू कर चुकी है और प्रबंधन के भर्ती अधिकार सीमित किए गए हैं।
अब इन स्कूलों में बड़ी संख्या में खाली लिपिक और अन्य वर्ग-3 गैर-शैक्षणिक पदों को भरने के लिए भी सरकार को व्यापक अधिकार देने का प्रस्ताव है।
प्रस्तावित संशोधन के तहत इन पदों की भर्ती के नियम, चयन प्रक्रिया, कार्यप्रणाली और शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने का अधिकार सरकार के पास रहेगा।
विशेष शिक्षकों को भी कानून के दायरे में लाया जाएगा
1972 के मूल कानून में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए नियुक्त किए जाने वाले विशेष शिक्षकों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। नए संशोधन विधेयक में विशेष शिक्षकों की भर्ती, उनकी योग्यता, नियुक्ति और संबंधित प्रक्रियाओं को कानून के दायरे में लाने का प्रस्ताव है।
इससे दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए विशेष शिक्षा व्यवस्था से जुड़े शिक्षकों की नियुक्ति के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार हो सकेगा।
अनुदान प्राप्त स्कूलों को मिलेगा नया कानूनी दर्जा
प्रस्तावित संशोधन में अनुदान प्राप्त स्कूलों की कानूनी परिभाषा में भी बदलाव किया गया है। वर्ष 1972 के मूल कानून में इन्हें ‘निजी स्कूल’ की श्रेणी में रखा गया था।
अब संशोधन के जरिए इन्हें ‘सरकार सहायता प्राप्त स्कूल’ के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रस्ताव है। इससे ऐसे स्कूलों को अधिनियम के दायरे में लाने और उनके संचालन, भर्ती तथा प्रशासन से संबंधित नियमों को अधिक स्पष्ट बनाने की दिशा में बदलाव होगा।



