
IMF Warns Fuel Price Hike Middle East Crisis: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर भारत पर भी पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि यदि ईंधन की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की तुलना में डीजल और जेट ईंधन की कीमतों में अधिक तेजी से वृद्धि हुई है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ने वाले हैं। ईंधन की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होने पर परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत ने तेल आपूर्ति के लिए खोजे वैकल्पिक स्रोत, लेकिन जोखिम बरकरार
IMF की अक्टूबर 2026 की एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में तनाव के बावजूद भारत ने तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों से कच्चा तेल खरीदने का रास्ता अपनाया। इससे देश की तेल आपूर्ति पर संघर्ष का असर सीमित रखने में मदद मिली।
रिपोर्ट के मुताबिक, जून तक भारत में तेल की आपूर्ति संघर्ष से पहले के स्तर पर लौट आई थी। इससे संकेत मिलता है कि भारत ने आपूर्ति में आने वाली बाधाओं से निपटने के लिए दूसरे क्षेत्रों से तेल खरीदने की रणनीति अपनाई।
हालांकि, IMF का मानना है कि केवल नए स्रोतों से तेल खरीदना पर्याप्त नहीं है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और ईंधन उत्पादों की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे हालात में ईंधन की लागत, परिवहन खर्च और महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
डीजल महंगा हुआ तो सब्जियों और राशन की कीमतों पर पड़ सकता है असर
IMF की रिपोर्ट में एक अहम चिंता रिफाइंड ईंधन उत्पादों की कीमतों में तेजी को लेकर जताई गई है। कच्चे तेल की तुलना में डीजल और जेट ईंधन की कीमतों में अधिक तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
डीजल की कीमतों में वृद्धि होने पर माल ढुलाई और परिवहन की लागत बढ़ सकती है। भारत में सब्जियों, अनाज, राशन और रोजमर्रा की जरूरतों की कई वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए सड़क परिवहन का इस्तेमाल होता है।
ऐसे में परिवहन महंगा होने पर कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाली वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे आम परिवारों का मासिक बजट प्रभावित होने की आशंका है।
हालांकि, वस्तुओं की कीमतों में वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी, यह ईंधन की कीमतों, परिवहन लागत और बाजार की परिस्थितियों सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।
IMF की सलाह: जरूरतमंदों को ही मिले सब्सिडी का लाभ
ईंधन की कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी रहने से आम जनता के साथ-साथ सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी दबाव पड़ सकता है। यदि सरकार सभी उपभोक्ताओं के लिए ईंधन सस्ता रखने या व्यापक सब्सिडी देने का फैसला करती है, तो सरकारी खर्च बढ़ सकता है।
इसी संदर्भ में IMF ने जरूरतमंद और कमजोर वर्गों को लक्षित राहत देने पर जोर दिया है। इसका उद्देश्य उन लोगों को सहायता उपलब्ध कराना है, जो महंगाई और बढ़ती ऊर्जा लागत से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
लक्षित सब्सिडी के जरिए सरकार सीमित संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से कर सकती है। वहीं, व्यापक राहत योजनाओं के कारण सरकारी वित्त पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को भी नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
IMF का सुझाव है कि सरकारों को महंगाई से राहत देने और अर्थव्यवस्था में वित्तीय संतुलन बनाए रखने के बीच तालमेल स्थापित करना चाहिए।
वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक विकास दर 7% रहने का अनुमान
ईंधन की कीमतों और महंगाई को लेकर चिंताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को लेकर सकारात्मक अनुमान भी सामने आया है।
IMF के अनुमान के मुताबिक, मजबूत घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन के कारण वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत रहने की संभावना है।
घरेलू खपत और सेवा क्षेत्र की गतिविधियां भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की कीमतों में लगातार वृद्धि होने से विकास की इस गति को बनाए रखने में चुनौतियां आ सकती हैं।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना, तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाना और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से निपटने में मदद मिल सकती है।
क्या भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम फिर बढ़ेंगे?
IMF की चेतावनी का मुख्य आशय यह है कि मध्य पूर्व का संघर्ष यदि लंबे समय तक जारी रहता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, रिपोर्ट में जताई गई चिंता को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की घोषणा नहीं माना जाना चाहिए। घरेलू ईंधन की कीमतों में बदलाव होगा या नहीं, यह संबंधित नीतिगत फैसलों और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
फिलहाल आम उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऊर्जा की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से परिवहन, खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा की जरूरतों की लागत पर असर पड़ सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और सरकार के अगले कदमों पर नजर बनी हुई है।



