
नई दिल्ली: रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों के कारण वैश्विक ईंधन आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। रूस के डीजल निर्यात पर रोक और मध्य-पूर्व से आपूर्ति प्रभावित होने के बीच कई देश वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रहे हैं। ऐसे समय में भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता के कारण उसके परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी है।
भारत की भूमिका का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगस्त 2026 में तुर्किये ने भारत से रिकॉर्ड स्तर पर डीजल खरीदा, जबकि यूरोप जाने वाले बाब-अल-मंदेब मार्ग से गुजरने वाले डीजल में भारतीय रिफाइनरियों की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत रही।
रूस से आपूर्ति घटने पर तुर्किये ने भारत का रुख किया
तुर्किये लंबे समय से अपने डीजल आयात के लिए रूस पर काफी निर्भर रहा है। 2025 में रूस तुर्किये के डीजल आयात का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध करा रहा था और उसकी आपूर्ति लगभग 2.81 लाख बैरल प्रतिदिन थी।
लेकिन 2026 में रूस के डीजल निर्यात प्रतिबंध और उसकी रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमलों के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई। अगस्त में तुर्किये के डीजल आयात में रूसी हिस्सेदारी घटकर करीब 20 प्रतिशत रह गई।
इसी दौरान तुर्किये ने भारत और अमेरिका से डीजल खरीद बढ़ा दी। Kpler के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में तुर्किये ने भारत से 1.20 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक डीजल आयात किया। यह Kpler के 2017 से उपलब्ध आंकड़ों में सबसे ऊंचे मासिक स्तरों में शामिल है।
हालांकि, Energy Aspects के आंकड़े भारत से तुर्किये को अगस्त में करीब 74,000 बैरल प्रतिदिन आपूर्ति दिखाते हैं। अलग-अलग ऊर्जा डेटा एजेंसियों के आंकड़ों में अंतर होने के कारण वास्तविक मात्रा को स्रोत के संदर्भ में देखना जरूरी है।
यूरोप की डीजल आपूर्ति में भारत की बड़ी हिस्सेदारी
भारत की बढ़ती भूमिका सिर्फ तुर्किये तक सीमित नहीं है। ऊर्जा विश्लेषण कंपनी Vortexa के अनुसार, अगस्त 2026 में बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रास्ते यूरोप जाने वाले डीजल और गैसऑयल की करीब 60 प्रतिशत मात्रा भारतीय रिफाइनरियों से आई।
इस मार्ग से अगस्त में करीब 2 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल यूरोप की ओर भेजा गया। मार्च और अप्रैल में इस मार्ग से ईंधन की आवाजाही लगभग ठप होने के बाद अगस्त में आपूर्ति फिर बढ़ी।
रूस से डीजल आपूर्ति में गिरावट और अमेरिका से आने वाली खेपों में कमी के बीच भारतीय रिफाइनरियां यूरोपीय बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक स्रोत बन गई हैं।
भारत की रिफाइनिंग क्षमता बनी बड़ी ताकत
भारत की इस भूमिका के पीछे उसकी विशाल रिफाइनिंग क्षमता महत्वपूर्ण है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनिंग देश है और देश में 22 परिचालन रिफाइनरियों की कुल स्थापित क्षमता 258.1 मिलियन टन प्रति वर्ष है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 61.5 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया था। सरकार के अनुसार देश की रिफाइनिंग क्षमता घरेलू पेट्रोल और डीजल की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है।
भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन उसे घरेलू रिफाइनरियों में पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और अन्य उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात करता है। यही वजह है कि कच्चे तेल का आयातक होने के बावजूद भारत परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक है।
वैश्विक ईंधन संकट ने बढ़ाई भारतीय रिफाइनरियों की अहमियत
रूस के निर्यात प्रतिबंध, यूक्रेन के हमलों से रिफाइनरी क्षमता पर असर और पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण वैश्विक डीजल बाजार में आपूर्ति का दबाव बढ़ा है। सितंबर 2026 में वैश्विक डीजल कीमतों के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की रिपोर्टें भी सामने आई हैं।
ऐसे माहौल में भारत की रिफाइनिंग क्षमता उसे वैश्विक ईंधन बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर देती है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारत अकेले यूरोप या अन्य देशों की पूरी ईंधन जरूरत पूरी कर रहा है। अलग-अलग देशों की आपूर्ति कई स्रोतों से होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति लगातार बदल रही है।
फिलहाल आंकड़े यही संकेत देते हैं कि 2026 में वैश्विक ईंधन आपूर्ति में व्यवधान के बीच भारतीय रिफाइनरियां तुर्किये और यूरोप समेत कई बाजारों के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरी हैं।



