
Maldives China Port Deal: मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू हाल के दिनों में भारत के साथ संबंधों को लेकर सकारात्मक बयान देते नजर आए हैं। उन्होंने भारत के सहयोग से बने थिलामाले ब्रिज को दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार के योगदान की सराहना भी की थी। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद मालदीव के एक बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह परियोजना में चीन की बड़ी भूमिका सामने आई है।
मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड ने थिलाफुशी पोर्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के पहले चरण का ठेका चीन की सरकारी कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी को दिया है। खास बात यह है कि थिलाफुशी वही क्षेत्र है, जिसे भारत के सहयोग से तैयार किए जा रहे ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के तहत पुलों के नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है।
कचरा डंपिंग द्वीप से बनेगा बड़ा वाणिज्यिक बंदरगाह
थिलाफुशी माले के पश्चिम में स्थित एक कृत्रिम द्वीप है। वर्ष 1991 में इसे मुख्य रूप से नगर निगम के कचरे के निपटान के लिए विकसित किया गया था। अब मालदीव सरकार यहां एक बड़ा वाणिज्यिक बंदरगाह विकसित करने की योजना पर काम कर रही है, ताकि माले के मौजूदा बंदरगाह पर बढ़ते मालवाहक दबाव को कम किया जा सके।
परियोजना के पहले चरण में कई बड़े बदलाव किए जाने हैं—
- मौजूदा करीब 5 हेक्टेयर बंदरगाह क्षेत्र को बढ़ाकर 20 हेक्टेयर किया जाएगा।
- करीब 650 मीटर लंबी क्वे वॉल और 125 मीटर लंबी रोडसाइड जेटी बनाई जाएगी।
- बंधित गोदाम और आधुनिक एक्स-रे जांच सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
- स्वचालित तकनीक के जरिए माल की निकासी का समय करीब 5 दिन से घटाकर 48 घंटे करने का लक्ष्य रखा गया है।
- राष्ट्रपति मुइज्जू की योजना के अनुसार, माले के माफान्नु क्षेत्र में संचालित मुख्य वाणिज्यिक बंदरगाह की गतिविधियों को नवंबर 2027 तक थिलाफुशी स्थानांतरित किया जाना है।
एक ही रणनीतिक इलाके में भारत और चीन की मौजूदगी
थिलाफुशी बंदरगाह परियोजना को केवल व्यापारिक परियोजना के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसका रणनीतिक महत्व भी काफी अधिक है, क्योंकि यही इलाका भारत समर्थित ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
भारत ने इस परियोजना के लिए करीब 40 करोड़ डॉलर की ऋण सुविधा और 10 करोड़ डॉलर की अनुदान सहायता, यानी कुल करीब 50 करोड़ डॉलर का सहयोग दिया है। लगभग 6.7 किलोमीटर लंबे समुद्री संपर्क मार्ग के जरिए माले को विलिमाले, गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी से जोड़ने का काम किया जा रहा है।
इस परियोजना का निर्माण भारतीय कंपनी एफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर कर रही है।
यानी एक तरफ भारत की मदद से थिलाफुशी तक पहुंचने के लिए विशाल समुद्री संपर्क तैयार किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसी रणनीतिक क्षेत्र में बनने वाले प्रमुख बंदरगाह का निर्माण चीनी कंपनी करेगी। यही वजह है कि इस घटनाक्रम को भारत-चीन प्रतिस्पर्धा के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
‘इंडिया आउट’ से भारत के साथ नजदीकी तक, अब संतुलन की कोशिश?
मुइज्जू वर्ष 2023 में ‘इंडिया आउट’ अभियान की पृष्ठभूमि में सत्ता में आए थे और शुरुआती दौर में उनकी सरकार को चीन के प्रति अपेक्षाकृत अधिक झुकाव वाला माना गया। हालांकि, सत्ता संभालने के बाद मालदीव की आर्थिक चुनौतियों और बढ़ते कर्ज के बीच भारत के साथ संबंधों में सुधार हुआ।
भारत ने मालदीव को आर्थिक और विकास संबंधी सहयोग भी दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच रिश्तों में फिर से नजदीकी देखने को मिली।
लेकिन थिलाफुशी बंदरगाह का ठेका चीन को दिया जाना यह संकेत देता है कि भारत के साथ संबंध सुधारने के बावजूद मालदीव ने चीन के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को खत्म नहीं किया है।
माले की नीति: भारत भी जरूरी, चीन भी
मालदीव के लिए भारत और चीन दोनों का अपना-अपना महत्व है। भारत भौगोलिक रूप से निकट पड़ोसी होने के साथ विकास परियोजनाओं, व्यापार और आपदा सहायता में महत्वपूर्ण भागीदार है। दूसरी ओर चीन मालदीव के लिए बड़े बुनियादी ढांचा निवेश और आर्थिक सहयोग का प्रमुख स्रोत रहा है।
ऐसे में मुइज्जू सरकार दोनों देशों के बीच संतुलन साधने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। थिलामाले ब्रिज में भारत का सहयोग और थिलाफुशी बंदरगाह में चीन की भागीदारी—दोनों घटनाक्रम मालदीव की इसी संतुलन वाली विदेश और आर्थिक नीति की तस्वीर पेश करते हैं।



