राजकोट में भाजपा बनाम भाजपा की लड़ाई में बागी गुट भारी, लोधिका खरीद-बिक्री संघ चुनाव में बिना पार्टी समर्थन वाले उम्मीदवार जीते

Jayesh Radadiya BJP Rebellion: एशिया के सबसे बड़े माने जाने वाले राजकोट लोधिका खरीद-बिक्री संघ के चुनाव में भाजपा के भीतर की गुटबाजी खुलकर सामने आ गई। पार्टी नेतृत्व और स्थानीय संगठन के प्रयासों के बावजूद बगावत थम नहीं सकी। चुनाव में भाजपा के ही दो प्रभावशाली नेताओं जयेश रादडिया और प्रशांत कोराट के गुट आमने-सामने नजर आए। परिणामों में रादडिया समर्थक गुट का दबदबा साफ दिखाई दिया।

भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ बागियों ने दर्ज की जीत

संघ की कुल 15 सीटों में से 10 सीटें पहले ही निर्विरोध हो चुकी थीं, जबकि बाकी 5 सीटों पर सीधा मुकाबला हुआ।

इन पांच सीटों के लिए भाजपा प्रदेश नेतृत्व ने अपने अधिकृत उम्मीदवार घोषित किए थे और सभी सदस्यों को पार्टी के फैसले की जानकारी भी दी गई थी। इसके बावजूद पार्टी के निर्देशों के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे कुछ उम्मीदवारों ने जीत हासिल कर ली।

इस परिणाम ने सहकारी क्षेत्र में भाजपा के संगठनात्मक नियंत्रण और पार्टी अनुशासन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

किस सीट पर किसे मिली जीत?

माधापर समूह सीट

भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार पृथ्वीसिंह जाडेजा (घोघुभा) के सामने पार्टी से नाराज होकर मैदान में उतरे विजय सखिया ने जीत दर्ज की। चुनाव से पहले विजय सखिया ने अपने खर्च पर पुलिस सुरक्षा की मांग भी की थी।

कुवाडवा समूह सीट

पूर्व मंत्री अरविंद रैयाणी के सामने पार्टी के निर्देश के बावजूद चुनाव लड़ने वाले नीतिन चोवटिया विजयी रहे।

त्रंबा समूह सीट

इस सीट पर मुकाबला बेहद करीबी रहा और दोनों पक्षों को बराबर मत मिलने के बाद परिणाम अटक गया। इसके बाद पर्ची निकालकर फैसला किया गया, जिसमें नीतिन रमाणी विजेता घोषित हुए।

हलेण्डा समूह सीट

इस सीट पर भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार महेश आसोदरिया अपनी सीट बचाने में सफल रहे।

खोखडदड़ समूह सीट

रादडिया विरोधी गुट से जुड़े माने जाने वाले बाबू नसित ने एक मतदाता की अनुपस्थिति के बीच जीत दर्ज की।

तीन सीटों पर पार्टी के निर्देशों को चुनौती

चुनाव परिणामों के मुताबिक पांच contested सीटों में से तीन सीटों पर भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ मैदान में उतरे उम्मीदवारों को सफलता मिली।

इससे साफ है कि स्थानीय सहकारी संस्थाओं में वर्चस्व की लड़ाई के सामने प्रदेश नेतृत्व की ओर से किया गया कथित समझौता प्रयास प्रभावी नहीं रहा। चुनाव परिणामों ने भाजपा के भीतर चल रही गुटीय राजनीति को भी उजागर कर दिया है।

सहकारी क्षेत्र में जयेश रादडिया का प्रभाव फिर चर्चा में

जयेश रादडिया का नाम सहकारी क्षेत्र में पार्टी नेतृत्व के फैसलों के खिलाफ चुनाव लड़ने और जीत हासिल करने को लेकर पहले भी चर्चा में रहा है।

इससे पहले इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (IFFCO) के निदेशक पद के चुनाव में भी रादडिया की उम्मीदवारी को लेकर भाजपा के भीतर मतभेद सामने आए थे।

बताया गया था कि संगठन की ओर से किसी अन्य नेता को अधिकृत उम्मीदवार बनाए जाने के संकेत थे। इसके बावजूद जयेश रादडिया ने अपनी उम्मीदवारी वापस नहीं ली और चुनाव मैदान में बने रहे।

संगठन समर्थित उम्मीदवार को हराकर हासिल की थी जीत

IFFCO के उस महत्वपूर्ण चुनाव में रादडिया के सामने भाजपा के दूसरे गुट और संगठन समर्थित उम्मीदवार की चुनौती थी। पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति संभालने के प्रयास किए गए, लेकिन रादडिया पीछे नहीं हटे।

चुनाव परिणाम में रादडिया ने बड़े अंतर से जीत हासिल की और संगठन समर्थित उम्मीदवार को पराजित किया। इस जीत के बाद सौराष्ट्र के सहकारी क्षेत्र में उनके व्यक्तिगत प्रभाव को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हुई थी।

अब लोधिका खरीद-बिक्री संघ के चुनाव में भी पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के सामने बागी उम्मीदवारों की जीत ने भाजपा के भीतर सहकारी क्षेत्र की गुटबाजी और नेतृत्व के प्रभाव को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।