
Ration Card Holders: महंगाई के बीच राशन कार्ड धारकों के लिए सितंबर महीने में सरकारी अनाज के वितरण को लेकर नई व्यवस्था लागू की गई है। राज्य के अन्न एवं नागरिक आपूर्ति विभाग ने प्रति व्यक्ति मिलने वाले चावल की मात्रा में 2 किलो की कटौती कर दी है। पहले जहां प्रत्येक व्यक्ति को 3 किलो चावल मिलता था, वहीं अब सिर्फ 1 किलो चावल दिया जा रहा है।
चावल की मात्रा घटाए जाने से गरीब और मध्यम वर्ग के राशन कार्ड धारकों में नाराजगी देखने को मिल रही है। वहीं, चावल की कमी की भरपाई के लिए बाजरे की मात्रा बढ़ाई गई है।
चावल घटे, बाजरे का कोटा बढ़ा
नई व्यवस्था के तहत चावल की मात्रा 3 किलो से घटाकर 1 किलो प्रति व्यक्ति कर दी गई है। इसके बदले पोषक अनाज के रूप में बाजरे की मात्रा 1 किलो से बढ़ाकर 2 किलो प्रति व्यक्ति कर दी गई है।
इस महीने राशन की दुकानों पर अनाज का नया आवंटन पहुंच चुका है। हालांकि, कई कार्डधारकों का कहना है कि उनके परिवारों में बाजरे की तुलना में चावल की खपत काफी अधिक है।
दाल-चावल और खिचड़ी खाने वाले परिवारों की बढ़ी परेशानी
गुजरात के कई परिवारों के रोजमर्रा के भोजन में चावल महत्वपूर्ण हिस्सा है। दाल-चावल और खिचड़ी जैसे पारंपरिक भोजन बड़ी संख्या में घरों में नियमित रूप से बनाए जाते हैं।
राशन कार्ड धारकों का कहना है कि गेहूं और बाजरे की तुलना में उनके घरों में चावल की खपत ज्यादा होती है। ऐसे में अचानक चावल का कोटा कम होने से परिवारों को अतिरिक्त चावल खुले बाजार से खरीदना पड़ सकता है।
कार्डधारकों के मुताबिक, बाजार से अधिक कीमत पर चावल खरीदने का अतिरिक्त बोझ सीधे उनके घरेलू बजट पर पड़ेगा।
पहले 1 किलो मिलता था बाजरा, अब 2 किलो
पुरानी व्यवस्था में प्रति व्यक्ति 1 किलो बाजरा दिया जाता था। सितंबर में इसकी मात्रा बढ़ाकर 2 किलो कर दी गई है।
हालांकि, राशन कार्ड धारकों का कहना है कि बाजरे की बढ़ी हुई मात्रा उनकी वास्तविक जरूरत के अनुरूप नहीं है। उनका तर्क है कि चावल की मात्रा कम करने के बजाय सरकार को परिवारों की वास्तविक खपत और भोजन की आदतों को ध्यान में रखना चाहिए।
3 किलो चावल देने की मांग
राशन दुकानों पर पहुंच रहे नए अनाज के बीच कार्डधारकों ने सरकार से बाजरे की अतिरिक्त मात्रा के बजाय पहले की तरह 3 किलो चावल प्रति व्यक्ति देने की मांग की है।
कार्डधारकों का कहना है कि चावल की मात्रा में अचानक की गई कटौती पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए, ताकि महंगाई के दौर में गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।



