शराबबंदी से क्या हासिल हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने गिनाए 5 नुकसान

Supreme Court Alcohol Prohibition: शराबबंदी की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके कुछ संभावित नकारात्मक प्रभावों की ओर ध्यान दिलाया है। 18 सितंबर 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B को रद्द करने के मामले की सुनवाई के दौरान शराबबंदी से जुड़े पांच प्रमुख पहलुओं का उल्लेख किया।

कोर्ट ने राजस्व में कमी, शराबबंदी लागू करने की लागत, पुलिस भ्रष्टाचार, अवैध शराब के कारोबार और नशीले पदार्थों की समस्या जैसे मुद्दों की ओर ध्यान दिलाया। साथ ही, गुजरात सहित कई राज्यों में जहरीली शराब से हुई घटनाओं का भी उल्लेख किया गया।

शराबबंदी से जुड़े 5 प्रमुख नुकसान

1. सरकार को राजस्व का नुकसान

शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने से सरकार को शराब से मिलने वाले आबकारी राजस्व का नुकसान होता है। कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़े आर्थिक प्रभावों को उन प्रमुख पहलुओं में शामिल किया, जिन पर विचार किया जाना चाहिए।

2. कानून लागू करने पर भारी खर्च

शराबबंदी को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए पुलिस और प्रशासन को निगरानी, जांच, तस्करी रोकने और अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई पर संसाधन खर्च करने पड़ते हैं। कोर्ट ने शराबबंदी लागू करने में होने वाले इस खर्च को भी एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में रेखांकित किया।

3. भ्रष्टाचार का खतरा

सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी के संदर्भ में पुलिस में भ्रष्टाचार की समस्या का भी उल्लेख किया। जब किसी वस्तु की कानूनी बिक्री प्रतिबंधित होती है और उसकी मांग बनी रहती है, तो अवैध कारोबार को नियंत्रित करने की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

4. अवैध और जहरीली शराब का कारोबार

कोर्ट ने अवैध शराब बनाने और उसकी बिक्री को शराबबंदी से जुड़ी प्रमुख चिंताओं में शामिल किया। गुजरात के उदाहरण का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि लंबे समय से शराबबंदी लागू होने के बावजूद राज्य में कई बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हुई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, गुजरात में कम से कम 10 बड़ी घटनाओं में 600 से अधिक लोगों की मौत का उल्लेख अदालत की टिप्पणियों में किया गया।

कोर्ट की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि पूर्ण शराबबंदी अवैध शराब के कारोबार को भूमिगत कर सकती है, जिससे बिना नियमन वाली जहरीली शराब का खतरा बढ़ सकता है।

5. दूसरे नशीले पदार्थों की ओर बढ़ने का खतरा

पीठ ने शराबबंदी से जुड़े संभावित परिणामों में नशीले पदार्थों की समस्या का भी उल्लेख किया। यानी शराब की उपलब्धता पर रोक के बाद कुछ लोग दूसरे नशीले पदार्थों की ओर जा सकते हैं—हालांकि इसे हर व्यक्ति या हर राज्य पर लागू होने वाला निश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता।

1991 की मुंबई जहरीली शराब त्रासदी के बाद बने थे नियम

सुप्रीम कोर्ट का यह मामला सीधे तौर पर शराबबंदी कानून को चुनौती देने से संबंधित नहीं था। मामला महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B से जुड़ा था।

इन नियमों के तहत मेथनॉल की खरीद और बिक्री पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए थे। गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना अनिवार्य किया गया था।

इन नियमों की पृष्ठभूमि में वर्ष 1991 की मुंबई जहरीली शराब त्रासदी थी, जिसमें मेथनॉल युक्त जहरीली शराब पीने से करीब 93 लोगों की मौत हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने नियम 18A और 18B क्यों रद्द किए?

कोर्ट ने पाया कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की अनिवार्यता औद्योगिक उपयोग में परेशानी पैदा कर रही थी और अवैध शराब बनाने के लिए मेथनॉल के गलत इस्तेमाल की मूल समस्या को प्रभावी ढंग से हल नहीं कर रही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों को मनमाना और असंगत माना तथा संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) के संदर्भ में इन्हें असंवैधानिक ठहराया।

कोर्ट ने साथ ही मेथनॉल के दुरुपयोग और जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए लाइसेंस की कड़ी जांच, मेथनॉल के वास्तविक उपयोग की निगरानी, भंडारण और परिवहन पर सख्त नियंत्रण तथा स्टॉक का मिलान जैसे उपाय सुझाए।

महत्वपूर्ण: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश में शराबबंदी समाप्त करने का आदेश नहीं है। अदालत ने एक विशेष मामले में महाराष्ट्र के मेथनॉल संबंधी नियमों की संवैधानिक वैधता पर फैसला दिया और शराबबंदी के प्रभावों पर टिप्पणियां कीं।