
How will Thorium Become India’s Powerhouse?: ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना भारत की दीर्घकालिक प्राथमिकताओं में शामिल है। इसी दिशा में थोरियम को भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। दुनिया के कई देशों के सामने यूरेनियम संसाधनों और परमाणु ईंधन की उपलब्धता एक चुनौती है। ऐसे में भारत के लिए थोरियम इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि देश के पास इसके बड़े भंडार मौजूद हैं।
सितंबर 2026 में आयोजित जलवायु सम्मेलन के दौरान प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक और परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोडकर ने भी भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा स्वतंत्रता के लिए थोरियम के उपयोग को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। उनका सुझाव है कि भारत को अपने परमाणु कार्यक्रम में थोरियम के उपयोग को और तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए।
थोरियम क्या है?
थोरियम एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला हल्का रेडियोधर्मी तत्व है। इसका रासायनिक प्रतीक Th और परमाणु क्रमांक 90 है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसे भविष्य के परमाणु ऊर्जा स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण माना जाता है।
थोरियम सीधे उसी तरह ऊर्जा पैदा नहीं करता जैसे पारंपरिक परमाणु ईंधन करता है। इसे रिएक्टर में उपयुक्त प्रक्रिया के माध्यम से यूरेनियम-233 जैसे विखंडनीय ईंधन में बदला जाता है। यही वजह है कि थोरियम आधारित ऊर्जा के लिए विशेष तकनीक और ईंधन चक्र की आवश्यकता होती है।
तीन चरणों में तैयार किया गया भारत का परमाणु कार्यक्रम
भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम मूल रूप से तीन चरणों में विकसित किया गया है।
पहला चरण: प्राकृतिक यूरेनियम का इस्तेमाल कर प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) संचालित किए जाते हैं। इस चरण से प्लूटोनियम प्राप्त होता है।
दूसरा चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) में पहले चरण से प्राप्त प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके नए परमाणु ईंधन का उत्पादन किया जाता है। इसी प्रक्रिया में थोरियम को आगे इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक सामग्री तैयार की जा सकती है।
तीसरा चरण: भारत के बड़े थोरियम संसाधनों का इस्तेमाल करके थोरियम आधारित रिएक्टरों से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन करने का लक्ष्य है।
डॉ. काकोडकर का क्या है सुझाव?
डॉ. काकोडकर ने भारत के परमाणु कार्यक्रम में थोरियम के इस्तेमाल को आगे बढ़ाने का सुझाव दिया है। उनके अनुसार, भारत को तीसरे चरण की पूरी तरह प्रतीक्षा करने के बजाय मौजूदा PHWR प्रणाली में थोरियम के इस्तेमाल की संभावनाओं पर भी काम करना चाहिए।
भारत ने 2047 तक लगभग 100 गीगावाट विद्युत परमाणु क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। प्रस्तावित रणनीति में PHWR तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
थोरियम के साथ HALEU यानी उच्च परख वाला निम्न-संवर्धित यूरेनियम जैसे ईंधन विकल्पों के इस्तेमाल पर भी तकनीकी स्तर पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, मौजूदा रिएक्टरों में बड़े पैमाने पर थोरियम आधारित ईंधन का इस्तेमाल करने के लिए तकनीकी परीक्षण और ईंधन चक्र से जुड़े कई चरण पूरे करना जरूरी होगा।
थोरियम की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खासियत क्या है?
थोरियम स्वयं आसानी से विखंडन करने वाला ईंधन नहीं है। इसे रिएक्टर में उपयुक्त विखंडनीय पदार्थ की मदद से यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जाता है, जिसके बाद इससे ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
थोरियम ईंधन चक्र की एक खासियत यह है कि इसके संसाधन का अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है और ईंधन चक्र में इसे दोबारा इस्तेमाल करने की संभावनाएं भी मौजूद हैं। हालांकि, इसकी वास्तविक ऊर्जा दक्षता रिएक्टर के डिजाइन और पूरे ईंधन चक्र पर निर्भर करती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है थोरियम?
विशाल घरेलू संसाधन
भारत के पास दुनिया के महत्वपूर्ण थोरियम संसाधनों में से एक बड़ा हिस्सा मौजूद है। इसका बड़ा भंडार मुख्य रूप से मोनाजाइट युक्त तटीय रेत में पाया जाता है। इससे भारत को भविष्य में परमाणु ईंधन के क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त मिल सकती है।
आयात पर निर्भरता घटाने की संभावना
भारत वर्तमान में परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए यूरेनियम के आयात पर भी निर्भर है। यदि थोरियम आधारित परमाणु ईंधन चक्र व्यावसायिक स्तर पर सफलतापूर्वक विकसित होता है, तो लंबे समय में विदेशी ईंधन आपूर्ति पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा
थोरियम का सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। यदि देश अपने घरेलू संसाधनों का उपयोग करके बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा उत्पादन करने में सफल होता है, तो जीवाश्म ईंधन और आयातित परमाणु ईंधन पर निर्भरता कम की जा सकती है।
कम कार्बन वाली ऊर्जा
परमाणु ऊर्जा संचालन के दौरान कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है। इसलिए थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा को सफलतापूर्वक विकसित करने पर यह भारत के दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों में योगदान दे सकती है। हालांकि, रेडियोधर्मी कचरे और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं।
थोरियम तकनीक में भारत की अब तक की प्रगति
भारत कई दशकों से थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा तकनीक पर काम कर रहा है। इस दिशा में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं और अनुसंधान किए गए हैं।
कलपक्कम का फास्ट ब्रीडर रिएक्टर
तमिलनाडु के कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस तकनीक का उद्देश्य परमाणु ईंधन का अधिक प्रभावी उपयोग करना और भविष्य के थोरियम आधारित ईंधन चक्र के लिए आवश्यक यूरेनियम-233 के उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ना है।
निजी क्षेत्र की भागीदारी
भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। शांति अधिनियम, 2025 के बाद निजी कंपनियों के लिए परमाणु क्षेत्र में भागीदारी का रास्ता खुलने की बात कही गई है। टाटा पावर, रिलायंस और जेएसडब्ल्यू जैसी कंपनियों की संभावित भागीदारी से छोटे परमाणु रिएक्टरों के विकास को गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
HALEU और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
भारत अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए उन्नत ईंधन और तकनीक से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भी काम कर रहा है। HALEU तकनीक और परमाणु प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को लेकर भारत की अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साझेदारी भविष्य के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
BARC का KAMINI रिएक्टर
भारत ने KAMINI (कैलमिनेटेड? नहीं — KAMINI) अनुसंधान रिएक्टर के जरिए यूरेनियम-233 आधारित परमाणु ईंधन के इस्तेमाल की क्षमता पहले ही प्रदर्शित की है। यह रिएक्टर यूरेनियम-233 ईंधन पर चलता है, जिसे थोरियम से प्राप्त किया जा सकता है।
हालांकि, KAMINI जैसे अनुसंधान रिएक्टर की सफलता को सीधे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक थोरियम बिजली उत्पादन के बराबर नहीं माना जा सकता। इसके लिए बड़े रिएक्टर, ईंधन निर्माण, पुनर्प्रसंस्करण और सुरक्षा व्यवस्था सहित पूरे ईंधन चक्र को व्यावसायिक स्तर पर विकसित करना होगा।
क्या थोरियम भारत को ऊर्जा महाशक्ति बना सकता है?
थोरियम भारत के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता का एक महत्वपूर्ण दीर्घकालिक विकल्प जरूर हो सकता है, लेकिन इसे तुरंत मिलने वाला असीमित ऊर्जा स्रोत मानना सही नहीं होगा।
भारत के पास थोरियम के बड़े संसाधन, परमाणु ऊर्जा का लंबा अनुभव और यूरेनियम-233 से जुड़ी अनुसंधान क्षमता मौजूद है। अब सबसे बड़ी चुनौती इन वैज्ञानिक उपलब्धियों को सुरक्षित, आर्थिक और बड़े पैमाने पर व्यावसायिक परमाणु ऊर्जा उत्पादन में बदलने की है।
यदि भारत इस पूरी तकनीकी श्रृंखला को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो थोरियम देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और परमाणु ऊर्जा क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।



