
World Gujarati Language Day: आज 24 अगस्त को गुजराती भाषा के आदिकवि नर्मदाशंकर लालशंकर दवे यानी नर्मद की 193वीं जयंती के अवसर पर ‘विश्व गुजराती भाषा दिवस’ मनाया जा रहा है। समय के साथ गुजराती भाषा ने भी कई दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनाया है। इनमें से कई शब्द गुजराती में इतने घुल-मिल गए हैं कि अब वे विदेशी नहीं, बल्कि अपनी भाषा के ही शब्द लगते हैं।
वहीं, गुजराती के कई पारंपरिक शब्द धीरे-धीरे रोजमर्रा के इस्तेमाल से बाहर हो गए हैं। उदाहरण के तौर पर रात के भोजन के लिए ‘वाळु’ और सुबह के नाश्ते के लिए ‘शिरामण’ जैसे शब्द कभी आम बोलचाल का हिस्सा थे। आज इनकी जगह बड़ी संख्या में लोग ‘डिनर’ और ‘ब्रेकफास्ट’ जैसे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।
नर्मद ने गुजराती साहित्य को दी नई दिशा
सूरत में जन्मे कवि नर्मद का जीवन भले ही सिर्फ 53 वर्ष का रहा, लेकिन गुजराती भाषा और साहित्य में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। उनकी आत्मकथा ‘मारी हकीकत’ को गुजराती साहित्य की पहली आत्मकथा माना जाता है।
नर्मद अपनी स्पष्टवादिता और बेबाक लेखन के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने जीवन और विचारों को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। गुजराती साहित्य में आधुनिक चेतना और आत्माभिव्यक्ति को मजबूत करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
नर्मद ने तैयार किया गुजराती शब्दकोश
नर्मद ने गुजराती भाषा के शब्दों को व्यवस्थित रूप से संकलित करने का महत्वपूर्ण काम भी किया। अपने समय में उन्होंने हजारों गुजराती शब्दों को एक जगह एकत्र करने का प्रयास किया और करीब 25 हजार से अधिक शब्दों वाला शब्दकोश तैयार किया।
गुजराती भाषा पर दूसरी भाषाओं का प्रभाव भी सदियों पुराना है। भारत और ईरान के बीच व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संबंधों के चलते फारसी के कई शब्द गुजरात तक पहुंचे। इसी तरह अरबी, अंग्रेजी, पुर्तगाली और फ्रेंच भाषाओं के अनेक शब्द भी गुजराती बोलचाल का हिस्सा बन गए।
अरबी के कई शब्द गुजराती में हुए आम
गुजराती में इस्तेमाल होने वाले कई शब्द मूल रूप से अरबी भाषा से आए हैं। इनमें शामिल हैं:
हिसाब, कानून, दुनिया, तारीख, कीमत, खबर, हक, जरूरत, सबूत, सलाम, साहब, जलसा, इनाम।
आज इनमें से अधिकांश शब्द इतने सामान्य हो चुके हैं कि बोलचाल में इनके विदेशी मूल का ध्यान भी नहीं रहता।
फारसी के शब्द भी गुजराती में रचे-बसे
फारसी भाषा ने भी गुजराती शब्दावली को काफी प्रभावित किया है। रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कई शब्द फारसी मूल के हैं।
सरकार, दरवाजा, बाजार, दुकान, मेहमान, रंग, दरबार, कबाड़, कमर, बंदूक, चश्मा, नाश्ता, कलम, दफ्तर, दुश्मन।
इन शब्दों का इस्तेमाल आज गुजराती भाषा में पूरी सहजता के साथ किया जाता है।
अंग्रेजी के बिना आज की गुजराती अधूरी?
आधुनिक जीवनशैली और तकनीक के विस्तार के साथ अंग्रेजी के शब्द भी गुजराती में तेजी से शामिल हुए हैं।
पुलिस, अस्पताल, डॉक्टर, टिकट, ट्रेन, बस, स्टेशन, बोतल, मोबाइल, रेडियो, सिनेमा, होटल।
इनमें से कई शब्द अब गुजराती की रोजमर्रा की बातचीत का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
पुर्तगाली और फ्रेंच से भी आए शब्द
गुजराती भाषा में पुर्तगाली मूल के कुछ शब्द भी देखने को मिलते हैं, जैसे:
तमाकू, अनानास, बटाटा, पाव, साबुन।
वहीं फ्रेंच भाषा से जुड़े माने जाने वाले शब्दों में गैरेज और ब्यूरो जैसे शब्द शामिल हैं।
गुजराती के वे शब्द जो अब धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं
दूसरी भाषाओं के शब्दों के गुजराती में शामिल होने के साथ-साथ कई पारंपरिक गुजराती शब्द अब रोजमर्रा की भाषा से दूर होते जा रहे हैं।
गामोतरुं: बाहर गांव मेहमाननवाजी के लिए जाना।
मझियारा: संयुक्त परिवार।
झभलुं: छोटे बच्चों को पहनाया जाने वाला आरामदायक वस्त्र।
वहेल: दूल्हे को बैठाकर ले जाने के लिए सजाया गया छोटा वाहन।
पेहरण-खमीस: सामान्य शर्ट या पहनावा।
खूंटी: घर की दीवार में बनी वह जगह जहां पगड़ी, कपड़े या थैला टांगा जाता था।
गोख: दीवार में दरवाजे से कुछ ऊपर बनाया गया छोटा झरोखा।
डामचियो: दीवार में बना बड़ा खाना, जहां गद्दे और तकिए रखे जाते थे।
शिरामण: सुबह खेत या वाड़ी जाने से पहले किया जाने वाला पारंपरिक नाश्ता।
वाळु टाणुं: शाम के भोजन का समय।
वंडी: घर के आसपास मिट्टी से बनाई गई करीब 6 से 8 फीट ऊंची दीवार।
टबुड़ी: बच्चों के पानी पीने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला छोटा पीतल का बर्तन।
फळियुं: घर के सामने की जगह।
भाषा बदलती है, लेकिन विरासत बचाना भी जरूरी
भाषा का दूसरी भाषाओं से शब्द ग्रहण करना स्वाभाविक प्रक्रिया है। गुजराती ने भी सदियों से अरबी, फारसी, अंग्रेजी, पुर्तगाली और अन्य भाषाओं से शब्द अपनाए हैं। लेकिन इसी दौरान ‘शिरामण’, ‘वाळु’, ‘खूंटी’, ‘वंडी’ और ‘फळियुं’ जैसे पारंपरिक शब्द हमारी रोजमर्रा की भाषा से धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं।
विश्व गुजराती भाषा दिवस ऐसे ही शब्दों और गुजराती की समृद्ध भाषाई विरासत को याद करने का अवसर है। नई भाषाओं के शब्द अपनाने के साथ अपनी मूल शब्द-संपदा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।



