व्हाइट हाउस ने गुजरात, पुणे और चेन्नई को बताया ‘Ugly Sister Cities’! अमेरिकी नौकरियों को खतरे में डालने का आरोप

White House Trade Report: वैश्विक व्यापार जगत में अमेरिका की नई व्यापार नीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिका-चीन के बीच जारी टैरिफ संघर्ष के बीच भारत के तीन प्रमुख औद्योगिक केंद्र—पुणे, गुजरात और चेन्नई—अमेरिकी प्रशासन की एक हालिया रिपोर्ट में चर्चा का विषय बने हैं। 13 अगस्त 2026 को जारी ‘The Great Transshipment Scam: Rise, Scope, and Costs’ नामक रिपोर्ट में अमेरिका ने भारत समेत 40 से अधिक देशों पर चीनी सामान के जरिए अमेरिकी टैरिफ से बचने वाले ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क में संभावित भूमिका को लेकर चिंता जताई है।

रिपोर्ट में इन भारतीय औद्योगिक केंद्रों की तुलना अमेरिका के सिनसिनाटी, डेटन और कोलंबस जैसे औद्योगिक शहरों से की गई है और ‘Ugly Sister Cities’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है।

‘Ugly Sister Cities’ का क्या मतलब है?

रिपोर्ट में ‘Ugly Sister Cities’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे विदेशी उत्पादन केंद्रों के संदर्भ में किया गया है, जहां समान प्रकार के उत्पाद बनाए जाते हैं और वे अमेरिकी घरेलू उद्योगों के साथ बाजार में प्रतिस्पर्धा करते हैं।

सामान्य तौर पर ‘Sister Cities’ शब्द दो देशों के शहरों के बीच सहयोग और साझेदारी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इस रिपोर्ट में इसका इस्तेमाल अलग संदर्भ में किया गया है। इसके पीछे मुख्य मुद्दा ‘टैरिफ आर्बिट्रेज’ (Tariff Arbitrage) है।

आरोप यह है कि चीन पर लगाए गए ऊंचे अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए कुछ चीनी सामान तीसरे देशों के जरिए अमेरिका तक पहुंच सकते हैं। यदि किसी उत्पाद को तीसरे देश में मामूली प्रोसेसिंग, रीपैकेजिंग या दस्तावेजी बदलाव के बाद उस देश का उत्पाद बताकर अमेरिका भेजा जाता है, तो उस पर चीन से सीधे आयात की तुलना में कम टैरिफ लग सकता है।

क्या है ‘The Great Transshipment Scam’ रिपोर्ट?

अमेरिका ने चीन से आने वाले सामान पर वर्षों से ऊंचे टैरिफ लगाए हैं। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कुछ निर्यातक इन टैरिफ से बचने के लिए अपने सामान को सीधे अमेरिका भेजने के बजाय तीसरे देशों के रास्ते भेजते हैं।

इसी प्रक्रिया को ट्रांसशिपमेंट कहा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में तीसरे देश में मामूली प्रोसेसिंग, रीपैकेजिंग या दस्तावेजों में बदलाव के जरिए सामान को उस देश का उत्पाद दिखाने की कोशिश की जा सकती है।

अमेरिकी प्रशासन इसे एक व्यापक ‘शैडो ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क’ के रूप में देखता है।

भारत समेत कई देशों को ‘संभावित जोखिम’ बताया

अमेरिकी रिपोर्ट में भारत के अलावा कनाडा, जापान, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ जैसे देशों का भी उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट में यह जरूरी नहीं कहा गया है कि इन देशों की सभी कंपनियां अवैध गतिविधियों में शामिल हैं। बल्कि बड़े मैन्युफैक्चरिंग बेस, चीन के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंधों और अमेरिका को होने वाले बड़े निर्यात के कारण इन्हें संभावित जोखिम वाले ट्रांसशिपमेंट मार्गों के संदर्भ में देखा गया है।

अमेरिका के लिए समस्या कितनी बड़ी है?

रिपोर्ट में संभावित ट्रांसशिपमेंट के पैमाने को लेकर बड़े अनुमान दिए गए हैं। इसके अनुसार संभावित ट्रांसशिपमेंट का वार्षिक मूल्य $40 बिलियन से $303 बिलियन के बीच हो सकता है, जबकि केंद्रीय अनुमान लगभग $75 बिलियन बताया गया है।

अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि ऐसी गतिविधियों के कारण अमेरिका को संभावित टैरिफ राजस्व का नुकसान हो सकता है और घरेलू उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है।

रिपोर्ट में लगभग 4.5 लाख अमेरिकी नौकरियों के जोखिम में पड़ने की संभावना का भी उल्लेख किया गया है।

क्या चीनी पार्ट्स इस्तेमाल करने से भारतीय उत्पाद ‘चीनी’ हो जाता है?

नहीं।

यदि कोई भारतीय कंपनी चीन से कच्चा माल, स्टील, मोटर या अन्य पार्ट्स आयात करके भारत में पर्याप्त निर्माण, प्रोसेसिंग और असेंबली करती है, तो केवल चीनी इनपुट के इस्तेमाल से पूरा उत्पाद अपने आप चीनी उत्पाद नहीं बन जाता।

अमेरिकी प्रशासन की मुख्य चिंता कथित तौर पर उन मामलों को लेकर है, जहां चीन में तैयार माल को केवल वेयरहाउसिंग, री-लेबलिंग या गलत इनवॉइसिंग के जरिए किसी तीसरे देश का उत्पाद दिखाकर अमेरिका भेजा जाए।

इसलिए वास्तविक निर्माण और केवल पैकेजिंग या री-लेबलिंग के बीच अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है।

नई तकनीक से भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती बढ़ेगी?

अमेरिकी सीमा शुल्क अधिकारी संदिग्ध आयात की पहचान के लिए डेटा और तकनीक आधारित जांच को मजबूत कर रहे हैं। ऐसी जांच में शिपिंग रूट, कंपनियों की उत्पादन क्षमता, सप्लाई चेन और कंपनी के स्वामित्व से जुड़े विवरणों की जांच की जा सकती है।

इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अपने उत्पादन और सप्लाई चेन से जुड़े दस्तावेजों को पारदर्शी रखना और भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

भारतीय निर्यातकों के लिए क्या बदलेगा?

  • केवल ‘Made in India’ का लेबल पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
  • कंपनियों को अपने उत्पाद में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स और कच्चे माल के स्रोत का रिकॉर्ड रखना होगा।
  • भारत में वास्तव में कितना उत्पादन और वैल्यू एडिशन हुआ, इसका दस्तावेजी प्रमाण महत्वपूर्ण होगा।
  • भारतीय कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन से जुड़े रिकॉर्ड अधिक मजबूत और पारदर्शी रखने होंगे।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट?

भारत खुद को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने और चीन के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में अमेरिकी प्रशासन की यह रिपोर्ट भारतीय निर्यातकों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण है।

अमेरिका की चिंता यह सुनिश्चित करने की है कि भारत का इस्तेमाल केवल चीनी सामान को अमेरिकी बाजार तक पहुंचाने के वैकल्पिक रास्ते के रूप में न हो। दूसरी ओर, भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह वास्तविक उत्पादन, वैल्यू एडिशन और पारदर्शी सप्लाई चेन के जरिए खुद को एक विश्वसनीय वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग केंद्र के रूप में स्थापित करे।