
Shravan Somwar Puja Vidhi: श्रावण मास भगवान शिव की आराधना का पवित्र समय माना जाता है। इस महीने का पहला सोमवार, 17 अगस्त, भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा और जलाभिषेक से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
शिवपुराण के अनुसार पहले सोमवार का महत्व और पूजा विधि
शिवपुराण की विद्येश्वर संहिता के अनुसार, श्रावण मास में भगवान शिव माता पार्वती के साथ पृथ्वी लोक पर निवास करते हैं और भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होते हैं। श्रावण का पहला सोमवार पूरे महीने की शिव आराधना की शुरुआत का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से ज्योतिषीय दृष्टि से कुंडली में मौजूद चंद्र दोष शांत होता है और मन को स्थिरता मिलती है।
समुद्र मंथन और जलाभिषेक की पौराणिक कथा
शिवपुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, तब उसमें से अत्यंत भयंकर ‘हलाहल’ विष निकला। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया।
विष की गर्मी के कारण महादेव के शरीर में अत्यधिक दाह होने लगा। इस गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं और ऋषि-मुनियों ने भगवान शिव पर शीतल जल और दूध से अभिषेक किया। विष के प्रभाव को कम करने और शीतलता प्रदान करने के लिए उन्हें बिल्वपत्र भी अर्पित किया गया।
इसी धार्मिक मान्यता के कारण भगवान शिव को जलाभिषेक और बिल्वपत्र विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं।
बिल्वपत्र चढ़ाने का शास्त्रोक्त नियम
- बिल्वपत्र की तीन पत्तियां भगवान शिव की तीन आंखों और त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—का प्रतीक मानी जाती हैं।
- शिवपुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, बिल्वपत्र को इस प्रकार अर्पित करना चाहिए कि उसकी चिकनी सतह शिवलिंग को स्पर्श करे। पत्ता खंडित या टूटा हुआ नहीं होना चाहिए। उस पर राम नाम या चंदन का तिलक करके अर्पित करने से विशेष पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है।
- इस श्रावणी सोमवार को बिना किसी आडंबर के केवल श्रद्धा, शीतल जल और बिल्वपत्र अर्पित करके भी भगवान महादेव का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।



