
Sagbara Forest Land Protest: नर्मदा और सूरत जिलों की सीमा से लगे सागबारा और उमरपाड़ा क्षेत्र में जंगल की जमीन पर खेती को लेकर विवाद अब पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया है। जंगल की जमीन पर अधिकार और खेती के मुद्दे को लेकर स्थानीय आदिवासियों द्वारा शुरू किया गया धरना-प्रदर्शन और आंदोलन आज 17 अगस्त को 10वें दिन भी जारी रहा। हालांकि, अब तक प्रशासन की ओर से इस मामले का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया है।
महाराष्ट्र के विधायक अमशा पाडवी आंदोलन में शामिल हुए
गुजरात के स्थानीय नेताओं के बाद अब इस आंदोलन को पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से भी समर्थन मिला है। महाराष्ट्र के अक्कलकुवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक अमशा पाडवी सागबारा पहुंचे और आंदोलन कर रहे किसानों से मुलाकात की। उन्होंने आंदोलनकारियों को अपना पूरा सहयोग और समर्थन देने का भरोसा दिलाया।
अमशा पाडवी ने कहा, “मैं पहले आदिवासी समाज का भाई हूं, महाराष्ट्र या गुजरात का नहीं। धरने पर बैठे किसान हमारे आदिवासी भाई हैं। ये किसान वर्ष 2002 से यहां जमीन पर खेती करके अपना गुजर-बसर कर रहे हैं, इसलिए उन्हें जमीन पर खेती करने का कानूनी अधिकार मिलना चाहिए।”
10वें दिन भी समाधान नहीं, राजनीति गरमाई
आदिवासी अधिकारों और उनके मुद्दों को लेकर लगातार आवाज उठाने वाले विधायक अमशा पाडवी के आंदोलन में पहुंचने के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है।
जंगल की जमीन के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के आमने-सामने आने से राजनीतिक माहौल भी गरमा गया है। आंदोलन के 10 दिन पूरे होने के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई समाधान नहीं निकाले जाने से आदिवासियों और किसानों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
आंदोलनकारियों की मांगों पर जल्द फैसला नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में यह धरना-प्रदर्शन और अधिक उग्र रूप ले सकता है।
उमरपाड़ा में ‘जंगल बचाओ’ रैली और विरोध
गौरतलब है कि एक ओर सागबारा के किसान अपने अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उमरपाड़ा में ‘जंगल बचाओ, आदिवासी बचाओ’ रैली निकाली गई।
इस रैली के दौरान सागबारा के किसानों की ओर से उमरपाड़ा की जमीन पर हो रही खेती का विरोध किया गया।
पूरे घटनाक्रम के बीच अब सवाल उठ रहा है कि क्या जंगल की जमीन का यह विवाद ‘आदिवासियों के बीच संघर्ष’ और राजनीतिक विवाद का रूप लेता जा रहा है? दो जिलों में बढ़ता राजनीतिक तनाव और सत्ता पक्ष के नेताओं की अपनी ही सरकार के खिलाफ उठती आवाजें प्रशासनिक स्तर पर विवाद के समाधान और राजनीतिक दबाव को लेकर सवाल खड़े कर रही हैं।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार इस विवाद का कब और किस तरह समाधान करती है।



