नेपाल के PM बालेन शाह ने भारत-चीन को कहा धन्यवाद, बाढ़ राहत और बचाव सहायता के लिए जताया आभार

Nepal Floods: 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) ने भारत और चीन का आभार जताया है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने संकट की घड़ी में तेजी से आपातकालीन राहत सामग्री, तकनीकी टीमें और बचाव सहायता उपलब्ध कराई।

शाह ने संसद में यह बयान उस समय दिया, जब नेपाल-चीन सीमा से लगे बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान अभी भी जारी है।

भारत ने राहत सामग्री और बचाव सहायता भेजी

भारत ने बाढ़ से प्रभावित नेपाल के लिए राहत सामग्री भेजी है। भारतीय वायुसेना ने कई उड़ानों के जरिए आवश्यक राहत सामग्री प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाई।

भारत की ओर से विशेष खोज एवं बचाव सहायता की भी पेशकश की गई है। भारतीय टीमें हाइड्रोपावर टनल में बचाव अभियान के साथ-साथ हादसे में मारे गए या लापता लोगों से जुड़े फोरेंसिक कार्यों में भी सहयोग कर रही हैं।

चीन ने भी तेज किए राहत और रिकवरी ऑपरेशन

चीन ने अपनी सीमा से लगे प्रभावित इलाकों में बचाव और रिकवरी अभियान तेज किया है। बीजिंग ने क्षतिग्रस्त G216 हाईवे को भी दोबारा खोल दिया है, जो ग्यिरोंग सीमा चौकी की ओर जाता है।

हाईवे के दोबारा खुलने से भारी मशीनरी और विशेषज्ञ बचाव उपकरणों को प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद मिल रही है।

बाढ़ से नेपाल और तिब्बत के कुछ हिस्सों में सड़कें, पुल, बस्तियां और जलविद्युत परियोजनाएं बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई हैं।

मृतकों का आंकड़ा 1,100 के पार

26 अगस्त की आपदा नेपाल की हाल की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक बन गई है। Moneycontrol में प्रकाशित रिपोर्टों के हवाले से मृतकों की संख्या 1,100 से अधिक बताई गई है, जबकि हजारों लोगों के अब भी लापता होने की जानकारी है।

बताया गया है कि यह विनाशकारी बाढ़ हिमनद के ढहने के बाद आई, जिसके कारण नदी घाटियों में अचानक भारी मात्रा में पानी, बर्फ, चट्टान और मलबा बह गया।

बचाव दल अभी भी लापता लोगों की तलाश में जुटे हैं। वहीं, बरामद शवों की पहचान के लिए फोरेंसिक टीमें भी काम कर रही हैं।

राहत के साथ नेपाल ने उठाया ‘क्लाइमेट कंपनसेशन’ का मुद्दा

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत और चीन को धन्यवाद ऐसे समय आया है, जब नेपाल सरकार ने आपदा से निपटने के लिए मिलने वाली सहायता को जलवायु न्याय और मुआवजे के व्यापक मुद्दे से जोड़ना शुरू किया है।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने तर्क दिया है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान बेहद कम है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना उसे करना पड़ रहा है।

उनका कहना है कि नेपाल अंतरराष्ट्रीय सहायता को केवल ‘दान’ के तौर पर नहीं, बल्कि क्लाइमेट जस्टिस और मुआवजे के नजरिए से देखना चाहता है।

नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका को प्रमुख उत्सर्जक देशों में शामिल करते हुए यह तर्क रखा है कि जलवायु परिवर्तन से कमजोर देशों को होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी बड़े उत्सर्जकों को भी उठानी चाहिए।

इस बीच नेपाल सरकार विदेशी सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मिलने वाली आपातकालीन सहायता स्वीकार कर रही है। यानी तत्काल प्राथमिकता राहत और बचाव है, जबकि दीर्घकालिक स्तर पर काठमांडू जलवायु क्षति और उसके मुआवजे का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की तैयारी में है।