1 साल में 20% महंगा हुआ खाद्य तेल, अब आयात शुल्क में कटौती से मिलेगी राहत? जानें किस तेल पर कितना असर

नई दिल्ली: त्योहारों के मौसम से पहले खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार की ओर से आयात शुल्क में कटौती किए जाने की जानकारी सामने आई है। पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल जैसे प्रमुख खाद्य तेलों पर शुल्क घटाने से आयातित तेल की लागत कम होने की उम्मीद है। भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों और आयात शुल्क का घरेलू बाजार पर सीधा असर पड़ता है। Reuters की 16 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में भारत में वनस्पति तेलों की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी।

पाम और सोयाबीन तेल पर शुल्क में कटौती

दिए गए विवरण के अनुसार, कच्चे पाम तेल और कच्चे सोयाबीन तेल पर मूल सीमा शुल्क को 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने की बात कही गई है।

वहीं, रिफाइंड पाम तेल और रिफाइंड सोयाबीन तेल पर मूल आयात शुल्क 32.5 प्रतिशत से घटाकर 27.5 प्रतिशत किया गया है।

इसके अलावा कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल आयात शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य और रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर शुल्क 32.5 प्रतिशत से घटाकर 22.5 प्रतिशत करने की जानकारी दी गई है।

हालांकि, खाद्य तेल के आयात पर मूल सीमा शुल्क के अलावा कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर तथा सामाजिक कल्याण अधिभार जैसे अन्य शुल्क भी लागू होते हैं। इसलिए वास्तविक प्रभाव केवल मूल सीमा शुल्क की दर देखकर तय नहीं किया जा सकता।

सूरजमुखी तेल को मिल सकता है ज्यादा फायदा

उद्योग जगत के अनुसार, इस बदलाव से सूरजमुखी तेल के आयात को अपेक्षाकृत अधिक बढ़ावा मिल सकता है। इससे रिफाइनरियों के लिए आयात करना आकर्षक हो सकता है और घरेलू बाजार में पाम तथा सोयाबीन तेल पर दबाव कम हो सकता है।

भारत खाद्य तेल की अपनी जरूरत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आयात से पूरा करता है। पाम तेल के लिए मलेशिया और इंडोनेशिया, सोयाबीन तेल के लिए अर्जेंटीना तथा सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन जैसे देश भारत के प्रमुख स्रोतों में शामिल रहे हैं।

त्योहारों से पहले बढ़ सकती है आयात मांग

सितंबर से नवंबर के बीच देश में त्योहारों का मौसम रहता है। इस दौरान मिठाइयों, नमकीन और तली हुई खाद्य वस्तुओं की मांग बढ़ने से खाद्य तेल की खपत भी बढ़ती है।

Reuters के अनुसार, सरकार खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए आयात शुल्क में कटौती पर विचार कर रही थी। भारत दुनिया का सबसे बड़ा वनस्पति तेल आयातक है और घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है।

ऐसे में शुल्क में कटौती से आयातकों और रिफाइनरियों की लागत पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इसका पूरा लाभ खुदरा उपभोक्ताओं तक कितना पहुंचेगा, यह अंतरराष्ट्रीय कीमतों, डॉलर-रुपये की विनिमय दर, आयात लागत और घरेलू बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

पहले भी घटाया जा चुका है आयात शुल्क

भारत सरकार ने इससे पहले जून 2025 में कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल पर मूल सीमा शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत किया था। सरकार ने उस समय कहा था कि इसका उद्देश्य खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों से उपभोक्ताओं को राहत देना था।

इसके विपरीत, सितंबर 2024 में घरेलू तिलहन किसानों को समर्थन देने के लिए कच्चे खाद्य तेलों पर मूल सीमा शुल्क को बढ़ाकर 20 प्रतिशत किया गया था।

उपभोक्ताओं को कितनी राहत मिलेगी?

आयात शुल्क में कमी से खाद्य तेलों की आयात लागत कम होने की संभावना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में तेल की कीमत तुरंत और उसी अनुपात में घट जाएगी। खुदरा कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार, कच्चे तेल की कीमतों, विनिमय दर, परिवहन लागत और घरेलू आपूर्ति सहित कई कारकों का प्रभाव पड़ता है।

त्योहारों के मौसम से पहले सरकार का यह कदम खाद्य तेल की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव कम करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण हो सकता है।